Monday, February 19, 2018

प्रश्न?.....मुकेश कुमार तिवारी


प्रश्न?
हवा में तैरते हैं
जैसे प्रकाश की किरण में झलकते है
धूल के कण अंधेरे कमरे में
भले ही हम उन्हें देख नही पाये उजाले में


प्रश्न?
जमे रहते हैं किताबों की जिल्द पर
मेज की दराज में
शर्ट के कॉलर पर
या उलझे बालों में
कितना भी झाड़ो बुहारो 
प्रश्न उड़ कर इस जगह से उस जगह चले जाते है
या जमे रह जाते है सोफे की किनारो में फँसी धूल की तरह


प्रश्न?
अमीबा की तरह होते हैं
हर इक प्रश्न जब टूट्ता है समाधानों में
तो अपने हर हिस्से से पैदा करता है प्रश्न कई
जैसे चट्टान टूट कर बँट जाती है 
पत्थर, गिट्टी, रेत या धूल में
और ज़िन्दा रहती है टुकडों में बँटी हुई


प्रश्न?
बारूद की तरह होते हैं
जब तक बना सहा नही तो फूट पड़ते हैं।


प्रश्न?
तेजाब की तरह होते हैं 
जहाँ गिरे वहाँ अपनी छाप छोड़ी
या किसी और को पनपने नहीं दिया।


प्रश्न?
बंदूक की तरह होते हैं 
जब दगते है तो यह नहीं देखते 
कि दिल घायल होगा या मन आहत
बस आग उगलते हैं।


प्रश्न?
चाहे जैसे भी हो
प्रश्न, प्रश्न ही होते है
कई समाधानों का समांकलन
एक प्रश्न नहीं होता
एक प्रश्न के कई समाधान हो सकते हैं
प्रश्न, प्रश्न ही रहतें हैं।

-मुकेश कुमार तिवारी

Sunday, February 18, 2018

उदास गीत कहाँ वादियों ने गाया है.......शकुन्तला श्रीवास्तव

चला है साथ कभी बादलों में आया है
ये चाँद है कि मेरे साथ तेरा साया है।

ये दर्द मेरा है, जो पत्तियों से टपका है
ये रंग तेरा है, फूलों ने जो चुराया है।

ये भीगी शाम, उदासी, धुँआ, धुँआ, मंज़र
उदास गीत कहाँ, वादियों ने गाया है।

ये हौंसले की कमी थी कि सर झुकाये हुए
वो खाली हाथ समन्दर से लौट आया है।

सिसक सिसक के जला है मगर जला तो सही
मेरे चराग़ को आँधी ने आजमाया है।
-शकुन्तला श्रीवास्तव

Saturday, February 17, 2018

सहज गति बन जाये...डॉ. इन्दिरा गुप्ता


जीवन गहन गहर सम लागे 
जितनो जीते जाओ
गहराई त्यों त्यों बढ़े 
जितनो वामें समाओ! 

दिव्य रोशनी ज्ञान की 
रस्सी वाय बनाओ 
पकड़ रास फिर उतरो गहरे 
तनि ना घबराओ !

एकत्व रहे यदि भाव बिच
सहज गति बन जाये
भाव बने तब एक अनंता
सफल -सफलतम हो जाओ ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता

Friday, February 16, 2018

आँकड़े......के.पी. सक्सेना ’दूसरे’


मुक्तक :
कल मरे कुछ
और कल मर जाएँगे कुछ
चल पड़ा है 
रोज़ का यह सिलसिला
...............
आँकड़े
बस बाँचते हैं
हो इकाई या दहाई
सैकड़ा या सैंकड़ों
हो गयी पहचान गायब
बस लाश कितनी, ये गिनो

क्या दुकालू
क्या समारु
और फुलबतिया कहाँ
बाँट लेंगे
सब उन्हें ऐसे घरों में
घट गए
कुछ नाम जिनसे।
-के.पी. सक्सेना ’दूसरे’

Thursday, February 15, 2018

इश्क-ए - रवायत भारी है...डॉ. इन्दिरा गुप्ता

रात अकेली चाँद अकेला 
गुजर रहा हें  सन्नाटा 
चँद्र किरण जल बीच समाई 
जल उतरा जो चाँद ज़रा सा ! 
लहर चंदनिया  झुला रही है 
एहसास -ए - दिल भी डोल रहा 
चिर - चिर  झींगुर सा सन्नाटा 
बन्द द्वार सब खोल रहा ! 
तट - तरनी जल शाँत बह रहा 
चीड़ वृक्ष है दम साधे 
लो आज भी रजनी चल दी 
लिये अरमान प्यासे - प्यासे ! 
रोज आस बँधती टूटती 
सिलसिला आज भी जारी हें 
नहीँ आस छूटती फिर भी 
इश्क-ए - रवायत  भारी  है ! 

-डॉ. इन्दिरा गुप्ता✍

Wednesday, February 14, 2018

नदी को सागर मिला नहीं है.....निर्मला कपिला

गिला-औ-शिकवा रहा नहीं है
मलाल फिर भी गया नहीं है

तलाश उसकी हुई न पूरी
नदी को सागर मिला नहीं है

बुला के मुझको किया जो रुसवा
ये बज़्म की तो अदा नहीं है

ये तो मुहब्बत लगी अलामत
अलील दिल की दवा नहीं है

गुलों के जैसे जिओ खुशी से
के ज़िंदगी का पता नहीं है

ग़रूर दौलत प किस लिए हो
ये धन किसी का सगा नहीं है

शरर ये नफरत का किसने फेंका
जो आज तक भी बुझा नहीं है

किसी को शीशा दिखा रहा जो
वो दूध का खुद धुला नहीं है

उलाहना दूं उसे जो निर्मल
यही तो मुझसे हुया नहीं है

- निर्मला कपिला

Tuesday, February 13, 2018

एक नन्ही सी नाजुक-नर्म कविता .....स्मृति आदित्य


रोज ही 
एक नन्ही सी 
नाजुक-नर्म कविता 
सिमटती-सिकुड़ती है 
मेरी अंजुरि में..
खिल उठना चाहती है 
किसी कली की तरह...
शर्मा उठती है 
आसपास मंडराते 
अर्थों और भावों से..
शब्दों की आकर्षक अंगुलियां 
आमंत्रण देती है 
बाहर आ जाने का. ..
नहीं आ पाती है 
मुरझा जाती है फिर 
उस पसीने में, 
जो बंद मुट्ठी में 
तब निकलता है 
जब जरा भी फुरसत नहीं होती 
कविता को खुली बयार में लाने की...
कविता.... 
लौट जाती है 
अगले दिन 
फिर आने के लिए... 
बस एक क्षण 
केसर-चंदन सा महकाने के लिए....
-स्मृति आदित्य