Wednesday, December 13, 2017

मौत का मंतर न फेंक....डॉ. कुंवर बेचैन


दो दिलों के दरमियाँ दीवार-सा अंतर न फेंक
चहचहाती बुलबुलों पर विषबुझे खंजर न फेंक

हो सके तो चल किसी की आरजू के साथ-साथ
मुस्कराती ज़िंदगी पर मौत का मंतर न फेंक

जो धरा से कर रही है कम गगन का फासला
उन उड़ानों पर अंधेरी आँधियों का डर न फेंक

फेंकने ही हैं अगर पत्थर तो पानी पर उछाल
तैरती मछली, मचलती नाव पर पत्थर न फेंक

-डॉ. कुंवर बेचैन

Tuesday, December 12, 2017

दस क्षणिकाएँ .....सुशील कुमार

दस क्षणिकाएँ
1.

कवि बनना तो 
दूर की बात रही
मेरे लिए 
न जाने कब से 
लड़ रहा हूँ खुद से 
एक आदमी बनने की लड़ाई !

2. 

बड़े आदमी के खिलाफ 
यह बयान है केवल
इसे कविता समझने की 
भूल मत करना 
अरे, आदमी तो बन लूँ पहले!

3.

शब्द की यात्रा में 
एक भटका हुआ शख्स हूँ मैं
भूल गया हूँ कि
कहाँ से चला था
अब तक अपने उद्गम की ही तलाश में हूँ

4.

यात्रा तो तब शुरू होती है
जब कोई पता कर ले कि 
कहाँ से चला था,
अपनी यात्रा की दूरियाँ 
कैसे मापेगा वह 
कि अब तक कितनी डेग चला
प्रस्थान बिंदु ही जब मिट गई हो ?

5. 

मुझे पता नहीं कि
मैं कौन हूँ
क्या हूँ
क्यों हूँ यहाँ 
पदार्थ हूँ कि प्राण हूँ ,
देह हूँ कि देहधारी ?

6. 

इतनी यात्रा के बाद 
इतनी थकान के बाद 
यह होश आया कि जानूँ -
कहाँ से चला था 
कहाँ जाना है 
कितनी दूरी तय की ?
हरेक अगले कदम के साथ 
ली गई पिछले डेग की 
अब तक लंबाई नापता रहा हूँ।

7. 

सच और झूठ की 
इस यात्रा में 
झूठ की लंबाई तो
पूरी दुनिया जान रही
सच केवल हृदय जान रहा 
सच क्या है, इस खोज में 
घूमकर कहीं मैं 
वहीं तो नहीं पहुंच गया
जहाँ से कभी चला था ! 

8.

यह यात्रा नहीं है निरापद
जितना तुमसे लड़ा 
शेष दुनिया से भी
उससे अधिक खुद से लड़ रहा हूँ

खुद को बचाने के लिए
खुद को काट रहा हूँ
खुद को जीत कर
खुद को रोज हार रहा हूँ !

9.

इस सदी की यह 
सबसे बड़ी लड़ाई है मेरी 
न इसमें कोई अस्त्र है न शस्त्र
शंकित हूँ कि
अजेय हुआ हूँ कि पराजेय ?

10.

अपने पाँच चोरों को मारकर भी
मैं अजेय नहीं हुआ शायद !
अब सब कुछ हारकर 
बुद्ध का पता पूछ रहा हूँ 
-सुशील कुमार 
7004353450

Monday, December 11, 2017

सर्द हवा की थाप....कुसुम कोठरी


सर्द हवा की थाप ,
बंद होते दरवाजे खिडकियां
नर्म गद्दौ में रजाई से लिपटा तन 
और बार बार होठों से फिसलते शब्द 
आज कितनी ठंड है 
कभी ख्याल आया उनका 
जिन के पास रजाई तो दूर
हड्डियों पर मांस भी नही ,
सर पर छत नही 
औऱ आशा कितनी बड़ी
कल धूप निकलेगी और 
ठंड कम हो जायेगी 
अपनी भूख, बेबसी, 
औऱ कल तक अस्तित्व 
बचा लेने की लड़ाई 
कुछ रद्दी चुन के अलाव बनायें
दो कार्य एक साथ 
आज थोड़ा आटा हो तो 
रोटी और ठंड दोनों सेक लें ।
-कुसुम कोठरी...

Sunday, December 10, 2017

अमलतास....श्वेता मिश्र


छुवन तुम्हारे शब्दों की 
उठती गिरती लहरें मेरे मन की 
ऋतुएँ हो पुलकित या उदास 
साक्षी बन खड़ा है 
मेरे आँगन का ये 
अमलतास......
गुच्छे बीते लम्हों की 
तुम और मैं धार समय की 
डाली पर लटकते झूमर पीले-पीले 
धूप में ठंडी छाया 
नहीं मुरझाया 
मेरे आँगन का 
अमलतास..........
सावन मेरे नैनों का 
फाल्गुन तुम्हारे रंगत का 
हैं साथ अब भी भीगे चटकीले पल 
स्नेह भर आँखों में 
फिर मुस्काया मेरे आँगन का 
अमलतास............

-श्वेता मिश्र

Saturday, December 9, 2017

अहसास....डॉ. सरिता मेहता

इक सहमी सहमी आहट है
इक महका महका साया है।
अहसास की इस तन्हाई में,
ये साँझ ढले कौन आया है।

ये अहसास है या कोई सपना है,
या मेरा सगा कोई अपना है।
साँसों के रस्ते से वो मेरे,
दिल में यूँ आ के समाया है।
अहसास की इस तन्हाई में ......

गुलाब की पांखुड़ी सा नाज़ुक,
या ओस की बूँदों सा कोमल।
मेरे बदन की काया को,
छू कर उसने महकाया है।
अहसास की इस तन्हाई में ......

शीतल चन्दा की किरणों सा,
या नीर भरी इक बदरी सा।
जलतरंग सा संगीत लिए,
जीवन का गीत सुनाया है।
अहसास की इस तन्हाई में ......
-डॉ. सरिता मेहता

Friday, December 8, 2017

ये जर जर हवेली.....कुसुम कोठारी


जर जर हवेलियां भी
संभाले खडी है
प्यार की सौगातें
कभी झांका था
एक नन्हा अंकुर
दिल की खिडकी खोल
संजोये रखूंगी प्यार से
जब तक खुद न डह जाऊंगी 
ये जर जर हवेली
ना भूलेगी कभी
वो कोमल छुवन
वो नरम पवन
जो छू के उसे
छूती थी उसे
एक नन्हे के
कोमल हाथों जैसा
अहसास ना भूलेगी
ये जर जर हवेली ।
-कुसुम कोठारी 

Thursday, December 7, 2017

तेरी सदा पे मुझे लौटना पड़ा....आलोक यादव

आँखों की बारिशों से मेरा वास्ता पड़ा
जब भीगने लगा तो मुझे लौटना पड़ा 

क्यों मैं दिशा बदल न सका अपनी राह की 
क्यों मेरे रास्ते में तेरा रास्ता पड़ा 

दिल का छुपाऊँ दर्द कि तुझको सुनाऊँ मैं 
ये प्रश्न एक बोझ सा सीने पे आ पड़ा

खाई तो थी क़सम कि न आऊँगा फिर कभी 
लेकिन तेरी सदा पे मुझे लौटना पड़ा

किस - किस तरह से याद तुम्हारी सताए है 
दिल जब मचल उठा तो मुझे सोचना पड़ा

वाइज़ सफ़र तो मेरा भी था रूह की तरफ़ 
पर क्या करूँ कि राह में ये जिस्म आ पड़ा 

अच्छा हुआ कि छलका नहीं उसके सामने 
‘आलोक’ था जो नीर नयन में भरा पड़ा
- आलोक यादव