Tuesday, October 17, 2017

तू मेरी न सुन मगर कहूँगा......निजाम रामपुरी

कहने से न मनअ' कर कहूँगा 
तू मेरी न सुन मगर कहूँगा 

तुम आप ही आए यूँ ही सच है 
नाले को न बे-असर कहूँगा 

गर कुछ भी सुनेंगे वो शब-ए-वस्ल 
क्या क्या न में ता-सहर कहूँगा 

कहते हैं जो चाहते हैं दुश्मन 
मैं और तुम्हें फ़ित्ना-गर कहूँगा 

कहते तो ये हो कि तू है अच्छा 
मानोगे बुरा अगर कहूँगा 

यूँ देख के मुझ को मुस्कुराना 
फिर तुम को मैं बे-ख़बर कहूँगा 

इक बात लिखी है क्या ही मैं ने 
तुझ से तो न नामा-बर कहूँगा 

कब तुम तो कहोगे मुझ से पूछो 
मैं बाइस-ए-दर्द-ए-सर कहूँगा 

तुझ से ही छुपाऊँगा ग़म अपना 
तुझ से ही कहूँगा गर कहूँगा 

मालूम है मुझ को जो कहोगे 
मैं तुम से भी पेश-तर कहूँगा 

हैरत से कुछ उन से कह सकूँगा 
भूलूँगा का इधर उधर कहूँगा 

कुछ दर्द-ए-जिगर का होगा बाइस 
क्यूँ तुझ से मैं चारा-गर कहूँगा 

अब हाल-ए-'निज़ाम' कुछ न पूछो 
ग़म होगा तुम्हें भी गर कहूँगा  


Monday, October 16, 2017

माँ चुप रह जाती है...............अमित जैन 'मौलिक'

मेरे हालात को मुझसे, पहले समझ जाती है
माँ अब कुछ नहीं कहती, चुप रह जाती है।

तब भी मुस्कराती थी, अब भी मुस्कराती है
माँ चुप रहकर भी, बहुत कुछ कह जाती है।

एक वक्त था जब सब, माँ ही तय करती थी
अब क्या तय करना है, तय नहीं कर पाती है।

तसल्लियों की खूंटी पर, टांग देती है ज़रूरतें
मेरी मुश्किलात माँ, पहले ही समझ जाती है।

जिसे दुश्वारियों के, तूफ़ान भी ना हिला पाये हों
वो अपने बच्चे के, दो आँसुओं में बह जाती है।

मेरी माँ कभी मेरी, जेबें खाली नहीं छोड़ती 
पहले पैसे भरती थी, अब दुआयें भर जाती है।

Sunday, October 15, 2017

कवि के हाथों में लाठी!...परितोष कुमार ‘पीयूष’


वो बात किया करते हैं
अक्सर ही स्त्री स्वतंत्रता की
बुद्धिजीवियों की जमात में 
उनका दैनिक उठना बैठना 
चाय सिगरेट हुआ करता है

साहित्यिक राजनीतिक मंचों से
स्त्री स्वतंत्रता के पक्ष में
धाराप्रवाह कविता पाठ किया करते हैं
अखबारी स्तंभों में भी 
यदा कदा नजर आ ही जाते हैं
नवलेखन, साहित्य अकादमी, 
साहित्य गौरव, साहित्य शिरोमणि, कविताश्री
और पता नहीं क्या-क्या इकट्ठा कर रखा है
उसने अपने अंतहीन परिचय में

सड़क से गुजरते हुए
एकदिन अचानक देखा मैंने
उनके घर के आगे 
भीड़! शोर शराबा! 
पुलिस! पत्रकार!
कवि के हाथों में लाठी!
मुँह से गिरती धाराप्रवाह गालियाँ!
थोड़े ही फासले पर फटे वस्त्रों में खड़ी
रोती-कपसती एक सुंदर युवती
और ठीक उसकी बगल में 
अपाहिज सा लड़खड़ाता एक युवक

इसी बीच 
भीड़ की कानाफूसी ने मुझे बताया
पिछवाड़े की मंदिर
उनकी बेटी ने दूसरी जाति में
विवाह कर लिया है

मैं अवाक् सोचता रहा
कि आखिर किनके भरोसे 
बचा रहेगा हमारा समाज
क्या सच में कभी
स्त्रियों को मिल पायेगी
उनके हिस्से की स्वतंत्रता
-परितोष कुमार ‘पीयूष’ 

Saturday, October 14, 2017

मिट्टी के घरोंदे है, लहरों को भी आना है......मनोज सिंह”मन”

मिट्टी के घरोंदे है, लहरों को भी आना है,
ख्बाबों की बस्ती है, एक दिन उजड़ जाना है,

टूटी हुई कश्ती है, दरिया पे ठिकाना है,
उम्मीदों का सहारा है,इक दिन चले जाना है,

बदला हुआ वक़्त है, ज़ालिम ज़माना है,
यंहा मतलबी रिश्ते है, फिर भी निभाना है,

वो नाकाम मोहब्बत थी, अंजाम बताना है,
इन अश्कों को छुपाना है, गज़ले भी सुनाना है,

इस महफ़िल में सबको, अपना ही माना है,
“मन” कैसा है दोस्तों, ये आपको ही बताना है,


Friday, October 13, 2017

मुक्तक.............नरेंद्र श्रीवास्तव


क़िस्मत
~~~~~
किसान के दिन
परेशानियों ने लादे
आसमान से
ओले मिले
नेताओं से वादे।
....

प्यासे
~~~~
वे
अच्छे अच्छों को
पानी पिलाते हैं
बाक़ी
प्यासे रह जाते हैं
*
प्रशंसक
~~~~~
एक नेता ने
कमाल कर दिखाया
उन्होंने
खिलौने में 
प्लास्टिक का
कुत्ता खरीदा
प्रशंसक दौड़कर
प्लास्टिक के
बिस्किट ले आया।
*
चमत्कार
~~~~~~
उनका
कुरता पायजामा
चमत्कार
दिखलाता है
काम बनाता है।
*
गड्ढे
~~~
सड़क के गड्ढे
उनके
बड़े काम आते हैं
जेब भर जाते हैं।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव

Thursday, October 12, 2017

तेरी ज़रूरत ज्यादा है..........अमित जैन 'मौलिक'


रोमांटिक ग़ज़ल । लव ग़ज़ल । ग़ज़ल । Gazal । Best love gazal
मेरी उजरत कम, तेरी ज़रूरत ज्यादा है
ऐ ज़िंदगी कुछ तो बता, तेरा क्या इरादा है।

दांव पर ईमान लगाकर, तरक़्क़ी कर लेना
आज के दौर का, फ़लसफ़ा सीधा सादा है।

हड़बड़ी में दिख रहा, ख्वाहिशों का समंदर
लहरों में उफान है, आसमां पे चाँद आधा है।

ऐ जम्हूरियत तू भी, अब पहले जैसी नहीं रही
आजकल मुल्क में काम कम, शोर ज्यादा है।

बहुत हुई बारूदों की ज़िद, ये तमंचों की होड़ 
ख़ुदा ख़ैर करे, अभी क्या कम खून ख़राबा है।

नूर की ख़ातिर सितारे को, इतना ना निचोड़ो
सीधा चाँद को थामो, ये तो उसका एक प्यादा है।

Wednesday, October 11, 2017

क्या है मुझ में............नौबहार 'साबिर'

बूंदी पानी की हूं थोड़ी-सी हवा है मुझ में
इस बिज़ाअत पे भी क्या तुर्फ़ां इना है मुझ में

ये जो इक हश्र शबो-रोज़ बपा है मुझ में
हो न हो और भी कुछ मेरे सिवा है मुझ में

सफ़्हे-दहर पे इक राज़ की तहरीर हूं मैं
हर कोई पढ़ नहीं सकता जे लिखा है मुझ में

कभी शबनम की लताफ़त कभा शो'ले की लपक
लम्हा-लम्हा ये बदलता हुआ क्या है मुझ में

शहर का शहर हो जब अर्सए-मशहर की तरह
कौन सुनता है जो कुहराम मचा है मुझ में

वक्त ने कर दिया 'साबिर' मुझे सहरा-ब-किनार
इक ज़माने में समुंदर भी बहा हो मुझ में
- नौबहार 'साबिर'
शब्दार्थः
बिज़ाअत -पूंजी, तुर्फ़ां -विचित्र,  इना -अहं, हश्र -प्रलय, 
शबो-रोज़ -रात-दिन, बपा -मचा हुआ, सफ़्हे-दहर -संसार रूपी पन्ने, तहरीर -लेख, लताफ़त -कोमलता, अर्सए-मशहर -प्रलय क्षेत्र, 
सहरा-ब-किनार - मरुस्थल के अंक में