Thursday, November 17, 2016

औ’ सदा को गंध उस की सो गई............महेश चन्द्र गुप्त 'ख़लिश'


एक नन्हा फूल कल तक थी कली
आज चकित सी पवन में हिल रही
देख कर वो रंग भरी पांखुरी
मन ही मन निज रूप पर थी खिल रही

गंध मदमाती हॄदय को मोहती
छा रही उपवन में चारों ओर थी
पुष्प के रंगीन जीवन की यह
आज पहली -पहली किंचित भोर थी

तितलियों के संग वह मस्ती भरी
था अजब अठखेलियाँ सी कर रहा
कोई भंवरा गिर्द उस के घूम कर
था प्रणय का गान कर सुस्वर रहा

किन्तु उस के भाग्य में कुछ और था
एक घटना अप्रतिम सी हो गई
तोड़ कर कुचला नियति के हाथ ने
औ’ सदा को गंध उस की सो गई.

-महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश

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