Saturday, September 23, 2017

मैं, कीर्ति, श्री, मेधा, धृति और क्षमा हूं... स्मृति आदित्य



एक मधुर सुगंधित आहट। आहट त्योहार की। आहट रास, उल्लास और श्रृंगार की। आहट आस्था, अध्यात्म और उच्च आदर्शों के प्रतिस्थापन की। एक मौसम विदा होता है और सुंदर सुकोमल फूलों की वादियों के बीच खुल जाती है श्रृंखला त्योहारों की। श्रृंखला जो बिखेरती है चारों तरफ खुशियों के खूब सारे खिलते-खिलखिलाते रंग।

हर रंग में एक आस है, विश्वास और अहसास है। हर पर्व में संस्कृति है, सुरूचि और सौंदर्य है। ये पर्व न सिर्फ कलात्मक अभिव्यक्ति के परिचायक हैं, अपितु इनमें गुंथी हैं, सांस्कृतिक परंपराएं, महानतम संदेश और उच्चतम आदर्शों की भव्य स्मृतियां। इन सबके केंद्र में सुव्यक्त होती है -शक्ति। उस दिव्य शक्ति के बिना किसी त्योहार, किसी पर्व, किसी रंग और किसी उमंग की कल्पना संभव नहीं है।
-
'कीर्ति: श्री वार्क्च नारीणां 
स्मृति मेर्धा धृति: क्षमा।'   

अर्थात नारी में मैं, कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूं। दूसरे शब्दों में इन नारायण तत्वों से निर्मित नारी ही नारायणी है। संपूर्ण विश्व में भारत ही वह पवित्र भूमि है, जहाँ नारी अपने श्रेष्ठतम रूपों में अभिव्यक्त हुई है।   

आर्य संस्कृति में भी नारी का अतिविशिष्ट स्थान रहा है। आर्य चिंतन में तीन अनादि तत्व माने गए हैं - परब्रह्म, माया और जीव। माया, परब्रह्म की आदिशक्ति है एवं जीवन के सभी क्रियाकलाप उसी की इच्छाशक्ति होते हैं। ऋग्वेद में माया को ही आदिशक्ति कहा गया है उसका रूप अत्यंत तेजस्वी और ऊर्जावान है।  

फिर भी वह परम कारूणिक और कोमल है। जड़-चेतन सभी पर वह निस्पृह और निष्पक्ष भाव से अपनी करूणा बरसाती है। प्राणी मात्र में आशा और शक्ति का संचार करती है।   

'अहं राष्ट्री संगमती बसना 
अहं रूद्राय धनुरातीमि'   

अर्थात् - 
'मैं ही राष्ट्र को बांधने और ऐश्वर्य देने वाली शक्ति हूं। मैं ही रूद्र के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाती हूं । धरती, आकाश में व्याप्त हो मैं ही मानव त्राण के लिए संग्राम करती हूं।'  

विविध अंश रूपों में यही आदिशक्ति सभी देवताओं की परम शक्ति कहलाती हैं, जिसके बिना वे सब अपूर्ण हैं, अकेले हैं, अधूरे हैं।   

हमारी यशस्वी संस्कृति स्त्री को कई आकर्षक संबोधन देती है। मां कल्याणी है, वही पत्नी गृहलक्ष्मी है। बिटिया राजनंदिनी है और नवेली बहू के कुंकुम चरण ऐश्वर्य लक्ष्मी आगमन का प्रतीक है। हर रूप में वह आराध्या है।  

पौराणिक आख्यान कहते हैं कि अनादिकाल से नैसर्गिक अधिकार उसे स्वत: ही प्राप्त हैं। कभी मांगने नहीं पड़े हैं। वह सदैव देने वाली है। अपना सर्वस्व देकर भी वह पूर्णत्व के भाव से भर उठती है। नवरात्रि पर्व पर देवी के हर रूप को नमन। 





- स्मृति आदित्य
.......
अत्यंत हर्ष का विषय है कि 
दिनांक 23 सितंबर को वेबदुनिया 
अपनी स्थापना के 18 वर्ष पूर्ण करने जा रही है।
हार्दिक शुभकामनाएँ
-यशोदा

Friday, September 22, 2017

अहसासों की शैतानियाँ ...सीमा "सदा"


खूबसूरत से अहसास, 
शब्‍दों का लिबास पहन 
खड़े हो जाते जब
कलम बड़ी बेबाकी से 
उनको सजाती संवारती 
कोई अहसास 
निखर उठता बेतकल्‍लुफ़ हो 
तो कोई सकुचाता 
.... 
अहसासों की शैतानियाँ 
मन को मोह लेने की कला, 
किसी शब्‍द का जादू 
कर देता हर लम्‍हे को बेकाबू 
खामोशियाँ बोल उठती 
उदासियाँ खिलखिलाती जब 
लगता गुनगुनी धूप 
निकल आई हो कोहरे के बाद 
अहसासों के बादल छँटते जब भी 
कलम चलती तो फिर 
समेट लाती ख्‍यालों के आँगन में 
एक-एक करके सबको !!!!
-सीमा "सदा"

Thursday, September 21, 2017

आहिस्ता.....प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


तेरी ख़ातिर आहिस्ता,
शायद क़ामिल हो जाऊँगा।
या शायद बिखरा-बिखरा,
सब में शामिल हो जाऊँगा॥

शमा पिघलती जाती है,
जब वो यादों में आती है।
शायद सम्मुख आएगी,
जब मैं आमिल हो जाऊँगा॥

पेशानी पर शिकन बढ़ाती,
जब वो बातें करती है।
नहीं पता कब होश में आऊँ,
कब क़ाहिल हो जाऊँगा॥

उसकी नज़रें दर-किनार,
मेरी नज़रों को कर देती हैं।
सारी रंजिश दूर हटाकर,
खुद साहिल हो जाऊँगा॥

वह तितर-बितर मेरे मन की,
हर ख़्वाहिश को कर देती है।
कदम बढ़ा उसकी राहों में,
मैं राहिल हो जाऊँगा॥

हर एक गुज़ारिश उसकी,
अपनी किस्मत में लिख देता हूँ।
तक़दीर मेरी भी गूँज उठेगी,
जब क़ाबिल हो जाऊँगा॥

शब में आ कर ख़्वाबों पर,
अपना कब्ज़ा कर लेती है।
‘भोर’ तलक मैं आहिस्ता।
शायद ज़ामिल हो जाऊँगा॥

©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


Wednesday, September 20, 2017

जो भूले से भूल जाते बिखर गये होते....नीतू राठौर

जरा सी देर सही घर अगर गये होते
तेरे ही सीने से लग के निखर गये होते।

नहीं भूली हूँ जुदाई की शाम अब तक भी
जो भूले से भूल जाते बिखर गये होते।

अभी नहीं जो होता रूह से रूह का मिलना
तो इस जनम में दुबारा ठहर गये होते।

तेरा कभी तो सहारा होता तन्हाई में
तो हम भी शाम ढले अपने घर गये होते।

यूँ मन मेरा भी तो अटका रहा ख़्वाहिशों में
नहीं तो रूह छूकर "नीतू" ग़ुजरे गये होते।
-नीतू राठौर

Tuesday, September 19, 2017

खोई हुई पहचान हूँ मैं...राजेश रेड्डी

गीता हूँ कुरआन हूँ मैं
मुझको पढ़ इंसान हूँ मैं

ज़िन्दा हूँ सच बोल के भी
देख के ख़ुद हैरान हूँ मैं

इतनी मुश्किल दुनिया में
क्यूँ इतना आसान हूँ मैं

चेहरों के इस जंगल में
खोई हुई पहचान हूँ मैं

खूब हूँ वाकिफ़ दुनिया से
बस खुद से अनजान हूँ मैं
- राजेश रेड्डी

Monday, September 18, 2017

दस्तक देते कईं शब्द मेरे.....रश्मि वर्मा

सामर्थ्य नहीं अब शब्दों में
कहना कुछ भी है व्यर्थ तुम्हें।
अधरों के स्वर हो गए कंपित, 
अब रुँध चले हैं कंठ मेरे।
नयनों के अश्रु भी तुमसे
विनती कर के अब हार गए

मेरे संतापों के ताप से भी
ना रूद्ध ह्रदय के द्वार खुले
जो प्रश्न मेरे थे गए तुम तक
ना लौट के आया प्रत्युत्तर
दस्तक देते कईं शब्द मेरे
बैरंग चले आए मुझ तक
अब छोड़ दिया है आस सभी
भूला तेरा अपमान सभी
पशुता सा जो आघात किया
बेधा मन छल प्रतिघात किया
लो मुक्त किया हर बंधन से
अपने रूदन और क्रदन से
जी लो तुम मुक्त-मगन होकर
रच लो संसार नव-सृजन कर
- रश्मि वर्मा

Sunday, September 17, 2017

खिलौने वाला.....सुभद्रा कुमारी चौहान


वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।
हरा-हरा तोता पिंजड़े में
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।
सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।
गुड़िया भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा 'टी सेट' है
छोटे-छोटे हैं लोटा-थाली।
छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।
मुन्नू ने गुड़िया ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला कहती है
माँ से लेने को साड़ी
कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्या साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है।
अम्मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।
तुम सोचोगी मैं ले लूँगा
तोता, बिल्ली, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्चों के खेल।
मैं तो तलवार ख़रीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।
तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों-
को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते
रामचंद्र मैं बन जाऊँगा।
यही रहूँगा कौशल्याऊ मैं
तुमको यही बनाऊँगा
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।
पर माँ, बिना तुम्हारे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा?
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।
किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा
तो कौन मना लेगा
कौन प्यार से बिठा गोद में,
मनचाही चींजे़ देगा।
-सुभद्रा कुमारी चौहान

Saturday, September 16, 2017

सुख या फिर ख़ुशी..


चुनते हैं हम
सुख या फिर
ख़ुशी..
रह कर भी
शिविर में ..
प्रताड़नाओं के
हम मन के
मौसम को... 
बासन्ती बना सकते हैं
कोई इन्सान..
कोई वस्तु 
या फिर 
प्रक्रिया हो 
कोई भी....
इतनी बलशाली नहीं
कि हमारे मन पर
कब्ज़ा कर सके
वो भी बगैर हमारी 
मर्जी....और हम
मन से..करते हैं 
कोशिश...और
तलाश लेतें हैं
खुशियाँ...
-मन की उपज
#हिन्दी दिवस

Friday, September 15, 2017

मिट्टी से मशविरा न कर...अभिषेक शुक्ला


मिट्टी से मशविरा न कर, पानी का भी कहा न मान
ऐ आतिश-ए-दुरुं मेरी, पाबंदी-ए-हवा न मान

हर एक लुग़त से मावरा मैं  हूँ अजब मुहावरा
मेरी ज़बान में पढ़ मुझे, दुनिया का तर्जुमा न मान

होने में या न होने में मेरा भी कोई दखल है?
मैं हूँ ये उसका हुक्म है, इसको मेरी रज़ा न मान

टूटे हैं मुझ पे क़हर भी, मैंने पिया है ज़हर भी
मेरी ज़ुबाने तल्ख़ का इतना भी बुरा न मान

बस एक दीद भर का है, फिर तो ये वक़्फ़ए-हयात
उनके क़रीब जा मगर आँखों की इल्तिजा न मान

हर शाख ज़र्द ज़र्द है, हर फूल दर्द दर्द है
मुझ में ख़िज़ाँ मुक़ीम है, मुझको हरा भरा न मान

ज़ेब-ए-तन और कुछ नहीं, जुज़ तेरी आरज़ू के अब
तू भी मुहाल है तो फिर मुझ पर कोई क़बा न मान 
-अभिषेक शुक्ला 

Thursday, September 14, 2017

मौसम बदले, न बदले....अशोक वाजपेई


मौसम बदले, न बदले
हमें उम्मीद की
कम से कम
एक खिड़की तो खुली रखनी चाहिए।

शायद कोई गृहिणी
वसंती रेशम में लिपटी
उस वृक्ष के नीचे
किसी अज्ञात देवता के लिए
छोड़ गई हो
फूल-अक्षत और मधुरिमा।

हो सकता है
किसी बच्चे की गेंद
बजाय अनंत में खोने के 
हमारे कमरे में अंदर आ गिरे और
उसे लौटाई जा सके

देवासुर-संग्राम से लहूलुहान
कोई बूढ़ा शब्द शायद
बाहर की ठंड से ठिठुरता
किसी कविता की हल्की आंच में
कुछ देर आराम करके रुकना चाहे।

हम अपने समय की हारी होड़ लगाएँ
और दाँव पर लगा दें
अपनी हिम्मत, चाहत, सब-कुछ –
पर एक खिड़की तो खुली रखनी चाहिए
ताकि हारने और गिरने के पहले
हम अंधेरे में
अपने अंतिम अस्त्र की तरह
फेंक सकें चमकती हुई
अपनी फिर भी
बची रह गई प्रार्थना।
-अशोक वाजपेई
#हिन्दी दिवस

Wednesday, September 13, 2017

दोनों को अधूरा छोड़ दिया.....फैज अहमद फैज

वो लोग बहुत खुशकिस्‍मत थे
जो इश्‍क को काम समझते थे
या काम से आशिकी रखते थे
हम जीते जी नाकाम रहे
ना इश्‍क किया ना काम किया
काम इश्‍क में आड़े आता रहा
और इश्‍क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया 
-फैज अहमद फैज

Tuesday, September 12, 2017

माँ....निधि सक्सेना


तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हें हर जगह खोजा 
अलार्म की आवाज़ में..
छौंक की गंध में..
रामचरितमानस के पाठ में..
हर दर्द की दवा में..
बाबा के किस्सों में..
भाई की आंखों में
बेटे की मुस्कान में..
हर जगह थोड़ा थोड़ा पाया तुम्हें...
और उस रोज अचानक तुम मुझे समूची मिलीं
जब मैंने गुलाबी रंग की साड़ी पहनी
बड़ी सी लाल बिन्दी लगाई
हाथ भर चूड़ियाँ पहनी
माँग भर सिंदूर लगाया
और जैसे ही आईने के सामने खड़ी हुई
खिड़की से एक सूर्य किरण
मेरे मुख पर बिखर
मुझे दीपदीपा गई...
तुम बिलकुल ऐसी ही थीं
उजली और देदीप्यमान...
~निधि सक्सेना

Monday, September 11, 2017

बेदाग दिल ही रखा है....नीतू राठौर

नहीं देखा है कभी चाँद में दीवाने को
कहाँ ढूंढू उस भटकें हुए दीवाने को।

यूँ मैंने तुम्हें ही माँगा है इस ज़माने से
देखा है मैंने तो मजबूर इस ज़माने को।

मग्न होती हूँ नज़्म जब कोई सुनाने में
तराने चुनें है दिलकश जरा सुनाने को।

यूँ दाग दिल पर लगते नहीं लगाने से
बेदाग दिल ही रखा है दिल लगाने को।

हँसी की गूंज ही आए जिस आशियानें से
बताओ कैसे बचाओगे आशियानें को।

कभी मुकर न जाना वादे "नीतू" निभाने से
जहाँ की रस्मे है आना होगा निभाने को।
-नीतू राठौर

Sunday, September 10, 2017

रहमतों से फ़ासला हो जाएगा.....नवीन मणि त्रिपाठी

2122 2122 212
मत कहो हमसे जुदा हो जाएगा ।
वह मुहब्बत में फ़ना हो जाएगा ।।

इश्क के इस दौर में दिल आपका ।
एक दिन मेरा पता हो जाएगा ।।

धड़कनो के दरमियाँ है जिंदगी ।
धड़कनो का सिलसिला हो जाएगा ।।

इस तरह उसने निभाई है कसम ।
वह हमारा देवता हो जाएगा ।।

ऐ दिले नादां न कर मजबूर तू ।
वो मेरी ज़िद पर ख़फ़ा हो जाएगा ।।

पत्थरो को फेंक कर तुम देख लो ।
आब का ये कद बड़ा हो जाएगा ।।

मत निकलिए इस तरह से बेनकाब ।
फिर चमन में हादसा हो जाएगा ।।

अब अना से बढ़ रहीं नज़दीकियां ।
रहमतों से फ़ासला हो जाएगा ।।

- नवीन मणि त्रिपाठी

Saturday, September 9, 2017

रज सुरभित आलोक उड़ाता...मधु सिंह




तुहिन सेज पर ठिठुर-ठिठुर कर  
निशा  काल  के  प्रथम प्रहर में  
बैठा   एक     पथिक    अंजाना  
था तीब्र प्रकम्पित हिमजल में 

तभी प्रात की स्वर्णिम किरणें 
लगी मचलने व्योंम प्राची पर
हाथ पसारे  निस्सीम तेज ले  
लगी उतरने  हिम छाती  पर 

रज  सुरभित  आलोक  उड़ाता 
हिम-  शैलों   पर  भर अनुराग 
 मृदुल अनंग नित क्रीड़ा करता 
 भर- भर  बाँहों  में प्रेम- पराग


निद्रा   भंग    हुई   शैवालों की 
हिम-चादर गल लगी पिघलने
धवल   धरा   के    आँगन  में  
हरियाली  उग  लगी  बिहसनें


स्वांस सुगन्धित लगी मचलने 
पवन  हुआ   सुरभित  गतिमान 
प्रात  काल  की  लाली  बिखरी 
शीर्ष  शिखर  पंहुचा  दिनमान 


रह - रह  नेत्र  निमीलन करती 
बार-  बार  सोने  को  मचलती   
कल-कल निनाद के महारोर में 
स्नेह की बाती जल-जल बुझती



Friday, September 8, 2017

जड़ें…मंजू मिश्रा


काश कि 
हम लौट सकें 
अपनी उन्ही जड़ों की ओर 
जहाँ जीवन शुरू होता था  
परम्पराओं के साथ 
और फलता फूलता था  
रिश्तों  के साथ 
**
मधुर मधुर मद्धम मद्धम  
पकता था  
अपनेपन की आंच में 
 मैं-मैं और-और की
 भूख से परे 
जिन्दा रहता था  
एक सम्पूर्णता 
और संतुष्टि के 
अहसास के साथ 
**
-

Thursday, September 7, 2017

अब जाएँ कहाँ दिल के ठिकाने से निकलकर.....राजेश रेड्डी

सोचा न कभी खाने कमाने से निकलकर
हम जी न सके अपने ज़माने से निकलकर

जाना है किसी और फ़साने में किसी दिन
आये थे किसी और फ़साने से निकलकर

ढलता है लगातार पुराने में नया दिन
आता है नया दिन भी पुराने से निकलकर

दुनिया से बहुत ऊब कर बैठे थे अकेले
अब जाएँ कहाँ दिल के ठिकाने से निकलकर

किस काम की यारब तेरी अफ़सानानिग़ारी
किरदार भटकते हैं फ़साने से निकलकर

चहरों की बड़ी भीड़ में दम घुट सा गया था
साँस आई मेरी आइनाख़ाने से निकलकर

कोशिश से कहाँ हमने कोई शे’र कहा है
आये हैं गुहर ख़ुद ही ख़ज़ाने से निकलकर

- राजेश रेड्डी

हज़ज की मुज़ाहिफ़ सूरत
मफ़ऊल मफ़ाईल मुफ़ाईल फ़ालुन
22 11 22 11 22 11 22
http://aajkeeghazal.blogspot.in/2010/07/blog-post.html

Wednesday, September 6, 2017

प्रेम-समर्पण....डॉ. निधि अग्रवाल

हम स्त्रियां किसी से प्रेम नहीं करतीं......
हमें तो प्रेम है बस प्रेम के अहसास से!
हर रिश्ते में यह अहसास ही तलाशा करती हैं
जिसमें मिल जाए उसी की हो जाया करती हैं,
हमारे प्रेम का कोई रूप कोई आकार नहीं
जिस सांचे में डालो  वैसा ही ढल जाएगा,
कभी बहन कभी प्रेयसी कभी बेटी बन
ये समर्पित रहेगा और समर्पण ही चाहेगा,
ये अखबारों की तारीखों जैसा रोज बदलता नहीं
ये वो आयते हैं जो सजदे में झुकी रहती हैं,
मान लेती हैं जिसको भी अपना
समस्त जीवन दुआएं देती हैं,
बदल जाओ तुम अगर बदलना हो
भवरों सी चंचलता दिखलाओ,
स्त्री  तो  होती है जड़ों के मानिंद
अपनी मिट्टी से जुड़ी रहती हैं,
टूटती नहीं ये अपमानों से
प्यार के बोल सुन सब्र खोती हैं,
ओढ़ लेती हैं धानी चुनर मुस्कानों की
और फिर किसी कोने में छुप रो लेती हैं.

- डॉ. निधि अग्रवाल

Tuesday, September 5, 2017

प्रेत आएगा....बद्री नारायण


किताब से निकाल ले जायेगा प्रेमपत्र
गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खायेगा

चोर आयेगा तो प्रेमपत्र ही चुराएगा
जुआरी प्रेमपत्र ही दांव लगाएगा
ऋषि आयेंगे तो दान में मांगेंगे प्रेमपत्र

बारिश आयेगी तो प्रेमपत्र ही गलाएगी
आग आयेगी तो जलाएगी प्रेमपत्र
बंदिशें प्रेमपत्र ही लगाई जाएंगी

सांप आएगा तो डसेगा प्रेमपत्र
झींगुर आयेंगे तो चाटेंगे प्रेमपत्र
कीड़े प्रेमपत्र ही काटेंगे

प्रलय के दिनों में 
सप्तर्षि मछली और मनु
सब वेद बचायेंगे
कोई नहीं बचायेगा प्रेमपत्र

कोई रोम बचायेगा कोई मदीना
कोई चांदी बचायेगा कोई सोना

मै निपट अकेला 
कैसे बचाऊंगा तुम्हारा प्रेमपत्र
-बद्री नारायण

Monday, September 4, 2017

प्रतीक्षा...........महाकवि हरिवंश राय बच्चन

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?
मौन रात इस भाँति कि जैसे, को‌ई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सो‌ई खो‌ई-सी सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशा‌ओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारी तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आनेवाले,
पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले,
साँसें घूम-घूम फिर-फिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं,
मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता?

उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले,
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपना होश सम्हाले,
तारों की महफ़िल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से,
मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता?

बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती
रग-रग में चेतनता घुलकर, आँसु के कण-सी झर जाती,
नमक डली-सा गल अपनापन, सागर में घुलमिल-सा जाता,
अपनी बाहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता?

-महाकवि हरिवंश राय बच्चन

Sunday, September 3, 2017

औकात.....रचनाकार अज्ञात


एक माचिस की तिल्ली, 
एक घी का लोटा,
लकड़ियों के ढेर पे, 
कुछ घण्टे में राख.....
बस इतनी-सी है 
आदमी की औकात !!!!

एक बूढ़ा बाप शाम को मर गया , 
अपनी सारी ज़िन्दगी ,
परिवार के नाम कर गया,
कहीं रोने की सुगबुगाहट ,
तो कहीं फुसफुसाहट ....
अरे जल्दी ले जाओ 
कौन रखेगा सारी रात...
बस इतनी-सी है 
आदमी की औकात!!!!

मरने के बाद नीचे देखा , 
नज़ारे नज़र आ रहे थे,
मेरी मौत पे .....
कुछ लोग ज़बरदस्त, 
तो कुछ ज़बरदस्ती 
रो रहे थे। 

नहीं रहा.. ........चला गया...
चार दिन करेंगे बात.........
बस इतनी-सी है 
आदमी की औकात!!!!!

बेटा अच्छी तस्वीर बनवायेगा,
सामने अगरबत्ती जलायेगा ,
खुश्बुदार फूलों की माला होगी...
अखबार में अश्रुपूरित श्रद्धांजली होगी.........
बाद में उस तस्वीर पे,
जाले भी कौन करेगा साफ़...
बस इतनी-सी है 
आदमी की औकात !!!!!!

जिन्दगी भर,
मेरा- मेरा- मेरा किया....
अपने लिए कम ,
अपनों के लिए ज्यादा जिया...
कोई न देगा साथ...
जायेगा खाली हाथ....
क्या तिनका ले जाने की भी है हमारी औकात ???
ये है हमारी औकात
फिर घमंड कैसा ?
-रचनाकार अज्ञात

Saturday, September 2, 2017

वक़्त के साथ दौड़ता..वक़्त

आज मेरी सदा दीदी का जन्म दिन है..
प्रस्तुत है उन्हीं की लिखी एक कविता..

सब कुछ पा लेने के भ्रम में वह
जाने कितना कुछ 
खोता चला गया
...
टूटता रहा जब भी कुछ
वह उसे जोड़ने के क्रम में
कभी वादे करता
कभी मिन्नतें करता
कभी बांधकर गांठ
किसी न किसी तरह से
अपना काम चला ही लेता
...
होता मन जब भी प्रेम में
फूलों को तोड़ता
तुमसे स्नेह का रिश्ता जोड़ता
...
क्रोध की अग्नि में जब वह
अपना धैर्य खो देता
मैं की सर्वज्ञता में
रिश्तों को तोड़ता
....
वक़्त के साथ दौड़ता
इसको उसको सबको
पीछे छोड़ता
खुद का खुद से नाता तोड़ता !!
-सीमा 'सदा' सिंघल

Friday, September 1, 2017

प्रेम क्या भरे पेट की लग्ज़री है ?.....जया यशदीप घिल्डियाल

वो दिखा रही थी
"सोलापुर शादी व्हाट्सएप ग्रुप " में, 
लड़कों  के प्रोफाइल ।

भाभी!
इससे कुछ ही दिन पहले बात ख़त्म हुई
गोरा है ना ये ?
कार खरीदेगा शादी के बाद बोलता था
दुबई गया
एक ये है
अपने माँ -बाप से छुपाया इसने सब
मैं  थोड़ा  काली हूँ और घर-घर काम करती हूँ
इसके घर वाले नहीं माने

और एक ये
मुझसे कहता....
पहले रात को हस्बैंड-वाइफ वाली बातें करूं
फिर शादी का सोचेगा
मैंने ही ना कह दी

और इक ये
बस चैट करता था
फोन हमेशा उसके पिता करते
माँ बोली लड़के से बात करवा दो
वो बोले , शादी के बाद ....
अब उसने चैट बंद कर दी
मुझसे क्या गलती हुई ?
मैं  उससे प्यार  करने लगी थी
मैं बहुत रोई दस-पंद्रह दिन 

रंजो की शादी हुई ..
उसने मुझसे बात करनी छोड़ दी

श्यामा  का बेटा हुआ
उसकी मां ने उससे मिलने नहीं दिया
एक बच्चे को गोद में खिला रही थी
लोग समझे मेरा बेटा  है !

ओह !! अब मैं बच्चे की मां जैसी दिखने लगी ?
मैं  मोटी हो गई , पेट निकल आया ...
क्या मेरा चेहरा औरत सा लगने लगा ?
भाभी! उस दिन फिर मैं बहुत रोई
...तुझे किसी से तो प्यार होगा उससे ही शादी करना
प्यार करके शादी करने में ये सब प्रपंच नहीं  होते ।

दूधमुँही थी कि माँ  काम पर साथ  ले जाती , पिता गुजर गए थे
दस बारह साल में काम शुरू कर दिया – झाडू,पोछा,बर्तन
कितने ही मर्द थे !
कितनी ही आँखें!
जो नापती हर दिन बढती देह को
क्या करती एक तेरह – चौदह साल की लडकी

जब बर्तन मांज रही होती और 
मालिक निर्वस्त्र पीछे खड़ा हो जाता
मैं घबराई नहीं थी
हाथ – पाँव सुन्न नहीं हुए
मैं धक्का दे कर भागती रही
रौंदती कितनी ही नंग-धडंग देहों को
छब्बीस की पूरी हो गयी
मुझे  हुआ जब भी प्यार
उसमें  शादी कहाँ होती है ?

मुझे प्यार नहीं करना
अब मुझे शादी  करनी है
मुझे घर पर रहना  है
पर अब डर लगता है
क्या मेरी शादी  कभी नहीं  होगी ?
उसकी बातों  के बाद इक उलझन  सी रहती है
" प्रेम क्या भरे पेट की लग्ज़री " ?
-जया यशदीप घिल्डियाल