Tuesday, November 21, 2017

घर पहुँचना....कुंवर नारायण


हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर 
अपने अपने घर पहुँचना चाहते 

हम सब ट्रेनें बदलने की 
झंझटों से बचना चाहते 

हम सब चाहते एक चरम यात्रा 
और एक परम धाम 

हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं 
और घर उनसे मुक्ति 

सचाई यूँ भी हो सकती है 
कि यात्रा एक अवसर हो 
और घर एक संभावना 

ट्रेनें बदलना 
विचार बदलने की तरह हो 
और हम सब जब जहाँ जिनके बीच हों 
वही हो 
घर पहुँचना
1927-2017
-कुंवर नारायण

Monday, November 20, 2017

अबकी बार लौटा तो .......कुंवर नारायण सिंह


1927-2017
अबकी बार लौटा तो 
बृहत्तर लौटूंगा 
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं 
कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं 
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को 
तरेर कर न देखूंगा उन्हें 
भूखी शेर-आँखों से 

अबकी बार लौटा तो 
मनुष्यतर लौटूंगा 
घर से निकलते 
सड़को पर चलते 
बसों पर चढ़ते 
ट्रेनें पकड़ते 
जगह बेजगह कुचला पड़ा 
पिद्दी-सा जानवर नहीं 

अगर बचा रहा तो 
कृतज्ञतर लौटूंगा 

अबकी बार लौटा तो 
हताहत नहीं 
सबके हिताहित को सोचता 
पूर्णतर लौटूंगा
- कुंवर नारायण सिंह



Sunday, November 19, 2017

अपलक देखती रही.....मोनिका जैन 'पंछी'

तुम्हें याद है वो दिन 
जब हम आखिरी बार मिले थे 
फिर कभी ना मिलने के लिए। 

तुम्हें क्या महसूस हुआ 
ये तो नहीं जानती 
पर जुदाई के आखिरी पलों में 
मैं बिल्कुल हैरान थी। 

कुछ ऐसा लग रहा था जैसे 
अलग कर दिया है मेरी रूह को 
मेरे ही जिस्म से 
दिल काँप रहा था मेरा 
इस अनचाही विदाई की रस्म से। 

एक अनजाने से खौफ ने 
जकड़ लिया था मुझे 
और तेरे आँखों से ओझल होने के बाद भी 
अपलक देखती रही मैं बस तुझे। 

- मोनिका जैन 'पंछी'

Saturday, November 18, 2017

नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ,,,,बाबा नागार्जुन

प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा -
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वरना किसे नहीं भाँएगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!

- बाबा नागार्जुन

Friday, November 17, 2017

दीवारों की सीलन…उफ़...गौतम राजरिशी

ठिठुरी रातें, पतला कम्बल, दीवारों की सीलन…उफ़
और दिसम्बर ज़ालिम उस पर फुंफकारे है सन-सन …उफ़

दरवाजे पर दस्तक देकर बात नहीं जब बन पायी
खिड़की की छोटी झिर्री से झाँके है अब सिहरन…उफ़

छत पर ठाठ से पसरा पाला शब भर खिच-खिच शोर करे
सुब्ह को नीचे आए फिसल कर, गीला-गीला आँगन…उफ़

बूढ़े सूरज की बरछी में जंग लगी है अरसे से
कुहरे की मुस्तैद जवानी जैसे सैनिक रोमन…उफ़

ठंढ के मारे सिकुड़े-सिकुड़े लोग चलें ऐसे जैसे
सिमटी-सिमटी शरमायी-सी नई-नवेली दुल्हन…उफ़

हाँफ रही है धूप दिनों से बादल में अटकी-फटकी
शोख़ हवा ऐ ! तू ही उसमें डाल ज़रा अब ईंधन…उफ़

जैकेट-मफ़लर पहने महलों की किलकारी सुन-सुन कर
चिथड़े में लिपटा झुग्गी का थर-थर काँपे बचपन…उफ़

पछुआ के ज़ुल्मी झोंके से पिछवाड़े वाला पीपल
सीटी मारे दोपहरी में जैसे रेल का इंजन…उफ़
(01955-213171, 9419029557)

Thursday, November 16, 2017

ज़िन्दगी उम्मीद पर...गुलाब जैन

ज़िन्दगी उम्मीद पर कब तक रहेगी,
काग़ज़ की कश्ती है कब तक बहेगी।

क्यूँ, किसने, क्या कहा, फ़िक्र न करें,
दुनिया तो कहती है, कहती रहेगी।

जलती है वो भी इश्क़ में उसके,
शमा परवाने को, ये कैसे कहेगी।

ख़िज़ां गर है आई, फ़िज़ा होगी पीछे,
दोनों की दौड़ ये, बदस्तूर रहेगी।

तसव्वुर में जैसी परवाज़ होगी,
बुलंदी आसमां की भी वैसी रहेगी।
- गुलाब जैन

Wednesday, November 15, 2017

सोच में सीलन बहुत है......सीमा अग्रवाल

सोच में सीलन बहुत है
सड़ रही है,
धूप तो दिखलाइये

है फ़क़त उनको ही डर
बीमारियों का
जिन्हें माफ़िक हैं नहीं
बदली हवाएँ
बंद हैं सब खिड़कियाँ
जिनके घरों की
जो नहीं सुन सके मौसम
की सदाएँ

लाज़मी ही था बदलना
जीर्ण गत का
लाख अब झुंझलाइए

जड़ अगर आहत हुआ है
चेतना से,
ग़ैरमुमकिन, चेतना भी
जड़ बनेगी
है बहुत अँधियार को डर
रोशनी से,
किंतु तय है रोशनी
यूँ ही रहेगी

क्यों भला भयभीत है पिंजरा
परों से
साफ़ तो बतलाइए

कीच से लिपटे हुए है
तर्क सारे
आप पर, माला बनाकर
जापते हैं
और ज्यादा नग्न
होते है इरादे
जब अनर्गल शब्द उन पर
ढाँकते हैं

हैं स्वयं दलदल कि दलदल
में धंसे हैं
गौर तो फरमाइए

- सीमा अग्रवाल
काव्यालय

Tuesday, November 14, 2017

किन धागों से सी लूँ बोलो.....श्वेता सिन्हा

मैं कौन खुशी जी लूँ बोलो।
किन अश्कों को पी लूँ बोलो।
बिखरे लम्हों की तुरपन को
किन धागों से सी लूँ बोलो।

पलपल हरपल इन श्वासों से
आहों का रिसता स्पंदन है,
भावों के उधड़े सीवन को,
किन धागों से सी लूँ बोलो।

हिय मुसकाना चाहे ही न
अधरों से झरे फिर कैसे खुशी,
पपड़ी दुखती है जख़्मों की,
किन धागों से सी लूँ बोलो।

मैं मना-मनाकर हार गयी
तुम निर्मोही पाषाण हुये,
हिय वसन हुए है तार तार,
किन धागों से सी लूँ बोलो

भर आये कंठ न गीत बने
जीवन फिर कैसे मीत बने,
टूटे सरगम की रागिनी को,
किन धागों से सी लूँ बोलो।


Monday, November 13, 2017

शब्द... राजेन्द्र जोशी

लड़ते हैं, झगड़ते हैं
डराते हैं, धौंस दिखाते हैं

डरते हैं, दुबकते हैं
प्रेम करते ,

कांपते हैं
कभी तानाशाह होकर
भीख मांगते दिखते हैं.

मैं और वे
खेला करते हैं
मिलजुल कर
भोथरे हुए शब्दों को
धार देते हुए

हो जाते हैं मौन
अपना ही ताकत से
आपसी खेल में.


-राजेन्द्र जोशी
पत्रिका..8 मई 2016

Sunday, November 12, 2017

अहसास....डॉ. शैलजा सक्सेना

अकेलापन..
अहसास मन का,

संग-साथ..
कब जीवन भर का ?

वादे ..
रहे अधूरे

सपने..
कब हुए पूरे?,

इच्छा"..
समुद्री तरंगें,

आशा"..
जगाती उमंगें,

अनुभव..
कब सदा मीठा?

यथार्थ.
रहा सदा सीठा,

जाना..
कब स्वीकारा?

इसीलिए..
मन रहा हारा।।

-डॉ. शैलजा सक्सेना

Saturday, November 11, 2017

सच कहने पर कहाँ भलाई होती है.........राकेश कुमार श्रीवास्तव

सच कहने पर कहाँ भलाई होती है,
और झूठों के हाथ मलाई होती है।

अच्छा माल कमीशन में पिट जाता है,
घटिया की जमकर सप्लाई होती है।

सारे नियम शिथिल होकर रह जाते हैं,
जब दबंग की जेल मिलाई होती है।

बारूदों से उनकी यारी ठीक नहीं,
हाथ में जिनके दियासलाई होती है।

खोटे सिक्के वहीँ चलन में आते हैं,
सरकारों की जहाँ ढिलाई  होती है।

सीवन गर उघड़े तो फिर सिल जाती है,
उखड़े मन की कहाँ सिलाई होती है।
-राकेश कुमार श्रीवास्तव
कादम्बिनी से

Friday, November 10, 2017

प्यार का मौसम...!!!.....तरुणा मिश्रा ‘सदफ़’

प्यार का जब कोई भी मौसम नहीं..
मैं अगर बिखरी हूँ इसका ग़म नहीं ;

मेरी होकर भी सितम करती है ये..
कैसे कह दूँ ज़िंदगी बरहम नहीं ;

ज़िन्दगी के ज़ख्म जो भर देगा अब...
चारागर के पास वो मरहम नहीं ;

हर तरफ़ इक नूर की चादर बिछी...
ज़िंदगी सौगात तेरी कम नहीं ;

वो सुला कर जा चुका दिल का रबाब...
अब फिजां में प्यार की सरगम नहीं ;

रात भर रोती रही थी कहकशां ..
क्या वही आँसू तो ये शबनम नहीं..?

हर क़दम पर साथ ग़म के है ख़ुशी..
सूत है ये ज़िंदगी रेशम नहीं ;

देर से जीते मगर जीतेगा सच..
झूठ का ऊँचा कभी परचम नहीं ;

ज़िंदगी तू हार बैठी मुझसे क्यूँ...
आज़माने को बचा क्या दम नहीं ;

इस ग़ज़ल में ख़ूबियाँ भी हैं ‘सदफ़’...
गौर से देखो तो कमियाँ कम नहीं… !!

Thursday, November 9, 2017

तारों के पीछे....कुँवर कुसुमेश

छिपी है शै कोई तारों के पीछे,
ख़ुदा होगा चमत्कारों के पीछे.

मेरे महबूब तू गुम हो गया है,
सुकूने-दिल है दीदारों के पीछे,

सुना है डॉक्टर हड़ताल पर हैं,
खड़ी है मौत बीमारों के पीछे.

खबर सच्ची नहीं मिल पा रही है,
है कोई हाथ अखबारों के पीछे.

हमेशा प्यार से हिल मिल के रहना,
यही पैग़ाम त्योहारों के पीछे.

तेरे अपने 'कुँवर' दुश्मन हैं तो क्या,
चला चल तू इन्हीं यारों के पीछे.
  
 *************
शै = चीज़,  दीदार = दर्शन, 
सुकूने-दिल = दिल का सुकून.

Wednesday, November 8, 2017

फ़ायदा क्या है.....तरुणा मिश्रा

ये बता मुझसे  चाहता क्या है...
तेरे लहज़े का फ़लसफ़ा क्या है ;

तुझको आख़िर बता हुआ क्या है..
सोचता है तो सोचता क्या है ;

दिल की बातें हैं तुम न समझोगे..
और समझ लो तो फ़ायदा क्या है ;

आ रहा है वो पास क्यूँ इतना..
जाने अब उसका फ़ैसला क्या है ;

जिसको ख़्वाहिश नहीं है मंज़िल की..
क्या पता उसको रास्ता क्या है ;

क्या ख़ता हो गई पता तो चले ..
तू ये टुक टुक के देखता क्या है ;

मिलना चाहो तो मिल भी सकते हैं..
फ़ासला है तो फ़ासला क्या है ;

जब बिछड़ने का मन बना ही लिया..
फिर तू मुड़ मुड़ के देखता क्या है ;

उसका ख़त पढ़ चुकी हूँ कितनी बार..
ख़त में उसने मगर लिखा क्या है..!!
-'तरुणा'

Tuesday, November 7, 2017

कभी कभी बेहद डर लगता है.............सज्जाद ज़हीर


कभी कभी बेहद डर लगता है
कि दोस्ती के सब रुपहले रिश्ते
प्यार के सारे सुनहरे बंधन
सूखी टहनियों की तरह
चटख़ कर टूट न जाएँ
आँखें खुलें, बंद हों देखें
लेकिन बातें करना छोड़ दें
हाथ काम करें
उँगलियाँ दुनिया भर के क़ज़िए लिक्खें
मगर फूल जैसे बच्चों के
डगमगाते छोटे छोटे पैरों को
सहारा देना भूल जाएँ
और सुहानी शबनमी रातों में
जब रौशनियाँ गुल हो जाएँ
तारे मोतिया चमेली की तरह महकें
प्रीत की रीत
निभाई न जाए
दिलों में कठोरता घर कर ले
मन के चंचल सोते सूख जाएँ
यही मौत है!
उस दूसरी से
बहुत ज़ियादा बुरी
जिस पर सब आँसू बहाते हैं
अर्थी उठती है
चिता सुलगती है
क़ब्रों पर फूल चढ़ाए जाते हैं
चराग़ जलते हैं
लेकिन ये, ये तो
तन्हाई के भयानक मक़बरे हैं
दाइमी क़ैद है
जिस के गोल गुम्बद से
अपनी चीख़ों की भी
बाज़-गश्त नहीं आती
कभी कभी बेहद डर लगता है 

Monday, November 6, 2017

भावों का संप्रेषण शब्दों की डोर से


भावों का संप्रेषण
शब्दों की डोर
से पिरोया हार
साहित्य,भाषा का
परिवार,
दिल से
भावों को जोड़े..
भाषा का संसार,
सुंदर मन
भावों में रंगकर
इंद्रधनुषी
कूची कलम से
खींचतें चित्र अनुपम...
अनकहे भावों को रच के
सरसता,
साहित्य का उद्गार,
आईना
जनमानस का
स्वरूप झलकता
समाज का,
कैसे कह दे
न समन्वय
साहित्य में संस्कृति का,
कलमकारी होती अद्भुत....
सबका अपना
नज़रिया यहाँ,
कोई लालित्य
सुधिपान करता,
किसी के
मनोरंजन का
जरिया है यह,
सार्थक निरर्थक
का चक्र भारी
है वाक युद्ध
मर्यादा पर जारी,
विचारों के मंथन
बनाते,
मूर्ख और विद्वान,
विचारों का सृजन
होता नहीं व्यर्थ
बनकर इतिहास
जीवन काल के
पृष्ठों पर अंकित,
धरोहर बन साहित्य का
भाषा बताती संस्कृति,
न लौटेगा कभी
उस समय के संदर्भ में।
-श्वेता सिन्हा

Sunday, November 5, 2017

तेरी पलकों प जो ठहरा है आँसू....अंसार क़म्बरी


तेरी पलकों प जो ठहरा है आँसू
समन्दर से भी वो गहरा है आँसू

कहा था घर से मत बाहर निकलना
अजी सुनता नहीं बहरा है आँसू

ख़ुशी दिल में कोई आये तो कैसे
लगाये आँख पर पहरा है आँसू

समन्दर हो के भी प्यासी हैं आँखे
समन्दर हो के भी सहरा है आँसू

तुन्हारी आँख तो सूनी है लेकिन
तुम्हारे गाल पर लहरा है आँसू

अरे सुन 'क़म्बरी' दिल के महल पर
कोई परचम नहीं फहरा है आँसू
- अंसार क़म्बरी