Thursday, July 27, 2017

डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जी को श्रद्धांजलि।

 जुलाई- 27 पुण्यतिथि

 डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम

 शत-शत नमन

राष्ट्रपति, वैज्ञानिक, शिक्षक, फिलॉसफ़र और कमाल के इंसान 
एक व्यक्ति में इतनी गुण? 
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जी को श्रद्धांजलि।

“एक महान विचारक, विद्वान, विज्ञानविद और उच्च कोटी के मनुष्य, भारत के 11वें राषट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, एक ख्याती प्राप्त वैज्ञानिक इंजीनियर जिन्होने भारत को उन्नत देशों के समूह में सबसे आगे लाने के लिये प्रक्षेपण यानो तथा मिसाइल प्रऔद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है।”


मैं अब भी पूनम की रात में अपनी माँ काे याद करता हूँ। 
उस स्मृति की छवियाँ मेरी पुस्तक 
"अग्नि की उड़ान" 
में संग्रहित "माँ" कविता में उभरी हैंः .....
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम
.....

मिसाइल मैन

डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम

शत शत नमन
यह प्रस्तुति श्री कृष्णमोहन सिंह के द्वारा

" निशा " ......चंचलिका शर्मा


क्यों इतनी 
सुहानी लगती हो 
कुछ मासूम , कुछ नादान
कभी 
" नव निशा " सी लगती हो ....
एक 
रूमानी सी मुस्कान 
चेहरे पर लिए 
दिन 
भर की थकान सबकी 
ओझल करती 
सबको तुम सुलाती हो ...... 
- चंचलिका शर्मा

Wednesday, July 26, 2017

उपहार....अर्कित पाण्डेय

मैं रहा रात भर सोचता बस प्रिये,
दूँ क्या उपहार में जन्मदिन पर तुम्हें।

प्रातः आकाश की लालिमा दूँ तुम्हे,
या दूँ पंछियों का चहचहाता वो स्वर,
नीले आकाश की नीलिमा दूँ तुम्हे,
या दूँ भेंट पुष्पों का गुच्छा मधुर,

पर प्रकृति सी सजल तुम स्वयं हो प्रिये,
क्या ये उपहार देना उचित है तुम्हें।

मैं रहा रात भर सोचता बस प्रिये,
दूँ क्या उपहार में जन्मदिन पर तुम्हें।

अपने पुण्यों का सारा मैं फल दूँ तुम्हे,
या दूँ अपने हिस्से की सारी हंसी,
विधाता की स्याही कलम दूँ तुम्हें,
लिख लो तकदीर में अपने हर पल खुशी,

है जो दिल वो तेरा,है जो जो वो तेरी,
संग मेरे बचा क्या समर्पण को तुम्हे।

मैं रहा रात भर सोचता बस यही,
दूँ क्या उपहार में जन्मदिन पर तुम्हें


हाथ खाली हैं मेरे मैं क्या दूँ तुम्हें,
इस सघन विश्व में भी नहीं कुछ मेरा,
सारा जीवन समर्पित किया है तुम्हें,
मैं रहा बस तेरा,और रहूंगा तेरा,

दे रहा हूँ मैं तुमको वचन ये प्रिये,
सारे जीवन पर मेरे अब हक है तुम्हे।

मैं रहा रात भर सोचता बस प्रिये,
दूँ क्या उपहार में जन्मदिन पर तुम्हें।

-अर्कित पाण्डेय

Tuesday, July 25, 2017

एक शाश्वत सत्य ...निधि सक्सेना


घुंधला धुंधला सा स्वप्न था वो
तुम थमी थमी मुस्कुराहटों में गुम
हाथ में कलम लिए
मुझे सोचते
मुझे गुनगुनाते
मुझ पर नज़्म लिखते..
वहीं थिर गईं आँखे
वहीं स्थिर हो गया समय
सतत अविनाशी..
मैं उसी स्वप्न में कैद हो गई हूँ..
कि तुम चाहो
इससे अधिक कुछ चाह नही..
यही निर्वाण है मेरा
यही नितांत सुख..
आँखो में ठहरा ये स्वप्न
बस यही है एक शाश्वत सत्य ...
~निधि सक्सेना

Monday, July 24, 2017

आग, पानी और प्यास....प्रेम नंदन









जब भी लगती है उन्हें प्यास
वे लिखते हैं
खुरदुरे कागज के चिकने चेहरे पर
कुछ बूँद पानी
और धधकने लगती है आग !
इसी आग की आँच से
बुझा लेते हैं वे
अपनी हर तरह की प्यास !
मदारियों के
आधुनिक संस्करण हैं वे
आग और पानी को
कागज में बाँधकर
जेब में रखना
जानते हैं वे!
- प्रेम नंदन
संपर्क – 
उत्तरी शकुन नगर, 
सिविल लाइन्स, 
फतेहपुर, (उ०प्र०)|
मोबाइल – 09336453835
ईमेल - premnandan10@gmail.com

Sunday, July 23, 2017

आंखो से गिरे है मोती हजारो.....प्रीती श्रीवास्तव

तेरी बेवफाई का शिकवा सनम ! 
मै किसी से कर नही सकती !!

है गुनाहगार तू मेरा कहकर !
साहिब आहें भर नही सकती!!

इल्जाम क्या दूं मै तुझको !
बिन आइना संवर नही सकती !!

की हिमाकत मैने जहां मे सनम !
संगदिलो से जंग लड़ नही सकती !!

अब तो खुदाया का आसरा है !
दर्दे-दिल से अब गुजर नही सकती !!

लिख दूं नाम तेरा हर हरफ पर!
शरारत मै ऐसी कर नही सकती !!

तारीफ क्या करूं उस नाचीज की !
आबरू जिसकी बिगड़ नही सकती !!

आंखो से गिरे है मोती हजारो !
दामन खाली ये भर नही सकती !!

तराना क्या छेड़ू ग़ज़ल मे !
प्रीत बिन मुकम्मल कर नही सकती !!

कुछ नया कर जाऊं तो अच्छा! 
आखिरी दम मगर पढ़ नही सकती !!

सात फेरे सात जन्मों का बंधन!
सात आरजुये मगर निखर नही सकती!!

कर जाये वो वफा तेरे साथ भी! 
उम्मीद न कर ठहर नही सकती !!

तेरी पालकी में चार फूल अच्छे !
तेरे नाम से बगिया बिखर नही सकती !!

-प्रीती श्रीवास्तव..

Saturday, July 22, 2017

एक और क्षितिज .......चंचलिका शर्मा


क्षितिज के 
उस पार भी है 
एक और क्षितिज 
चल मन चलें उस पार ..........

जहाँ तितलियाँ
इठलातीं , इतराती 
लहराती लहरों सी है 
जैसे दूर सागर के उस पार .......

भटक नहीं 
किसी बंधन में 
छोड़ उस पार की चिंता 
रम जा अब सिर्फ़ ही इस पार ......... 
- चंचलिका शर्मा

Friday, July 21, 2017

माँ की सीख..... निधि सक्सेना



सुनो बेटा
वहाँ परदेस में
अपनी दोनों कलाईयों पर घड़ी बाँधे रखना..
हाँ ये कुछ अजीब जरूर है
पर इसमें हर्ज कुछ नही..
तुम्हारी बायीं कलाई पर बंधी घड़ी स्थानिक समय दिखाए
वहां की धारा के संग बहने के लिए..
और दायीं कलाई पर बंधी घड़ी पर
भारत का समय बाँधना 
कि अपने दायीं ओर से तुम हमेशा आश्वस्त रहो
कि हम हैं यहाँ हर वक्त हर घड़ी..
कि तुम्हें यहाँ के समय का संज्ञान रहे
कि तुम हमेशा बंधे रहो 
अपने भूमि से
अपने रिश्तों से..
कि घड़ी की टिक टिक
तुम्हें यहाँ की मधुरता की याद दिलाती रहे
पल पल आशा और सुख की स्मृतियाँ रहें
और वही टिक टिक
हर निराशा और कुंठा मिटाती रहे
लाचारी और बेबसी विस्मृत कराती रहे....
- निधि सक्सेना

Thursday, July 20, 2017

क्या आपने कभी इन पश्चिमी दार्शनिकों को पढ़ा है


*लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910)*
"हिन्दू और हिन्दुत्व ही एक दिन दुनिया पर राज करेगी, क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है"।

*हर्बर्ट वेल्स (1846 - 1946)*
" हिन्दुत्व का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिनत कितनी पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी और जीवन कट जाएगा । तभी एक दिन पूरी दुनिया उसकी ओर आकर्षित हो जाएगी, उसी दिन ही दिलशाद होंगे और उसी दिन दुनिया आबाद होगी । सलाम हो उस दिन को "।

*अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 - 1955)*
"मैं समझता हूँ कि हिन्दूओ ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया जो यहूदी न कर सके । हिन्दुत्व मे ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती है"।

*हस्टन स्मिथ (1919)*
"जो विश्वास हम पर है और इस हम से बेहतर कुछ भी दुनिया में है तो वो हिन्दुत्व है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी"।

*माइकल नोस्टरैडैमस (1503 - 1566)*
" हिन्दुत्व ही यूरोप में शासक धर्म बन जाएगा बल्कि यूरोप का प्रसिद्ध शहर हिन्दू राजधानी बन जाएगा"।

*बर्टरेंड रसेल (1872 - 1970)*
"मैंने हिन्दुत्व को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है । हिन्दुत्व पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में हिन्दुत्व के बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि हिन्दू ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना होगा "।

*गोस्टा लोबोन (1841 - 1931)*
" हिन्दू ही सुलह और सुधार की बात करता है । सुधार ही के विश्वास की सराहना में ईसाइयों को आमंत्रित करता हूँ"।

*बरनार्ड शॉ (1856 - 1950)*
"सारी दुनिया एक दिन हिन्दू धर्म स्वीकार कर लेगी । अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी। पश्चिम एक दिन हिन्दुत्व स्वीकार कर लेगा और हिन्दू ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा "।

*जोहान गीथ (1749 - 1832)*
"हम सभी को अभी या बाद मे हिन्दू धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही असली धर्म है ।मुझे कोई हिन्दू कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा, मैं यह सही बात को स्वीकार करता हूँ ।"

Wednesday, July 19, 2017

थोड़ा रोमांच भर लायें.....निधि सक्सेना



बहुत कड़वा हो गया है जिंदगी का स्वाद
चलो किसी खूबसूरत वादी से
थोड़ा रोमांच भर लायें..
मुद्दत हुई हमें जी भर के हँसे
चलें किसी दरिया किनारे
मौजों से थोड़ी मौजें मांग लायें..
दरक गया है कहीं कुछ भीतर
मन ठंडे बस्ते में पड़ा रहता है
चलो चाँद के थोड़ा करीब चलो
रूमानी होने का खेल करो
भीगे पाँव कुछ अठखेलियाँ हों
कि जिंदगी के मिज़ाज कुछ जहीन हों...
~निधि सक्सेना

Tuesday, July 18, 2017

एक आदत - सी हो गई है ....चंचलिका शर्मा









अब तो 
एक आदत - सी हो गई है , 
अपने आप से कहने की ,
"थकना मना है" ......

बेशुमार 
आँसुओं को पीकर 
मुस्कुरा कर कहने की , 
"रोना मना है" ........

औरत हूँ ,
औरों के लिए ही जीना है ,
आइने में भी अपना वजूद 
"ढूँढना मना है" ............ 

- चंचलिका शर्मा

Monday, July 17, 2017

#हिन्दी_ब्लॉगिंग.. कुछ दिन पहले.....डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव


कुछ दिन पहले इस किताब में -
महक रहे थे बरक नये।

जिल्दसाज तुम बतलाओ।
वे सफे सुनहरे किधर गये।

जहाँ इत्र की महक रवां थी।
जलने की बू आती है।

दहशत वाले बादल कैसे।
आसमान में पसर गये।

बूढ़ा होकर इंकलाब क्यों -
लगा चापलूसी करने।

कलमों को चाकू होना था।
क्यों चमच्च में बदल गये।

बंधे रहेंगे सब किताब में।
मजबूती के धागे से।

एक तमन्ना रखने वाले।
बरक-बरक क्यों बिखर गए।

जिल्दों से नाजुक बरकों को।
क्या तहरीर बचाएगी।

क्या मजनून बदलने होंगे।
गढ़ने होंगे लफ़्ज नए।

छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश

Sunday, July 16, 2017

सावन का महीना ! ......प्रीती श्रीवास्तव
















हर चेहरे पे निखार आयी है !!
बादल भी बरसे जमकर !
धरा की प्यास बुझायी है !!
बैरी सजनवां परदेश बसे !
याद उनकी बार बार आयी है !!
पाती लिख लिख हैरान हुई !
बागों में भी बहार आयी है !!

चूड़ी खनके हाथों मे !
पायल ने टेर लगायी है !!
पांव महावर लगाके !
हाथों में मेंहदी रचायी है !!
बन-ठन बैठी अंगना !
विरहा ने आग लगायी है !!
सखियां बोले बोली !
मिलकर हंसी उड़ायी है !!

दे दे कोई साथी संदेशवा !
आंख मेरी भर आयी है !!
अबके आना फिर न जाना !
बैरी बलम तुमको दुहाई है !!

- प्रीती श्रीवास्तव
महफिल से....

Saturday, July 15, 2017

सफल आदमी.......भास्कर चौधुरी

यह औरत ही है
जो घर को सम्हाल कर रखती है
कहा उसने
यह औरत ही है
जो आदमी को उसकी मंजिल तक पहुँचाती है
कहा उसने
और
सामाने बैठी औरतों की
ज़ोरदार तालियों के बीच
वह उतर आया
मंच से आहिस्ते आहिस्ते
झूमते झूमते !!


- भास्कर चौधुरी

Friday, July 14, 2017

ज़िंदगी ही से सवाल करता हूँ.......राजेश”ललित”शर्मा









समय ज़रा सरक
बैठने दे मुझे
अपने साथ
गुज़ारने दे चंद पल
कुछ करें बात
चलें कुछ क़दम
समझें हम तुम्हें
तुम हमें समझो
सच में बहुत
तेज़ चलते हो
रुको तो
सुनो तो
फिर निकल गये आगे
चलो मैं ही दम भरता हूँ
ज़िंदगी ही से सवाल करता हूँ
जवाब जब मिलेगा
सो मिलेगा।
-राजेश”ललित”शर्मा 

Thursday, July 13, 2017

आज हक़ीक़त सा ये किस्सा...पावनी दीक्षित 'जानिब'


मैंने उसके लिए अपना सबकुछ नीलाम कर दिया 
उसकी नज़रो में मैने खुदको ही नाकाम कर दिया।

वो मुझे समझे गुनहगार तो अब मर्ज़ी है उसकी
हमको लिखना था नाम, दिल उसके नाम कर दिया ।

तुमको खबर है दिलसे हारे है बस हम तुम्हारे हैं 
फिर क्यों अपनी नज़रों में मुझे बदनाम कर दिया ।

बेहद होकर मजबूर तेरे रास्ते से दूर आ गए निकल कर 
ठोकर लगे या सम्हलूं तूने तो यार अपना काम कर दिया ।

आओ सुनाए एक कहानी एक दीवाना था एक दीवानी
आज हक़ीक़त सा ये किस्सा मैने सरेआम कर दिया ।

जानिब नहीँ कोई शिकवा है बस ये शिकायत है थोड़ी
सुनो अब तुमने आगाज को क्यों अन्जाम कर दिया ।
- पावनी दीक्षित 'जानिब'

Wednesday, July 12, 2017

सब भेंट कर देना चाहती थी......निधि सक्सेना

















उस रोज मंदिर में
देवी माँ के समक्ष
भावविह्लल मैं
उन्हें अपने दुख दर्द
मान अपमान
विश्वास अविश्वास
आस निराश
सब भेंट कर देना चाहती थी..
अनुरक्त नयन माँ के नयनों में ठहर गए
कुछ जाने पहचाने से लगे उनके नयन
जैसे वर्षों से परिचित हों..
पहचानने का प्रयास किया
तो स्मरण हुआ
कि ये तो वही नयन हैं
जिन्हें मैं रोज़ आईने में देखती हूँ
ये मेरे ही नयन हैं..
बड़ा विचित्र अनुभव था 
जैसे मैं स्वयं के सम्मुख
अपनी ही शरण में 
खुद से ही साहस की गुहार कर रही थी...
और मैंने स्वयं को इच्छित वरदान दिया
मेरी सारी शक्ति मैं ही हूँ
मैं ही देवी हूँ
मैं ही राधा हूँ
मैं ही चेतन हूँ
मेरी ही प्रतीक्षा में जय है
मेरी ही प्रतीक्षा में कृष्ण हैं
फिर भय कैसा
फिर विपदा क्या...
मुस्कान भरी आश्वस्ति से माँ को प्रणाम किया
आज देवी माँ पर अपार श्रद्धा ही नही
अपूर्व प्रेम भी उमड़ आया...
~निधि सक्सेना

Tuesday, July 11, 2017

ऐ ज़िदगी, तू हार गयी दर्द देकर मुझे....श्वेता सिन्हा

श्वेता बहन ने 
दर्द को मेरे 
किया महसूस 
हलका किया 
मेरी पीड़ा को
तन-मन के दाह को
पोछा मेरे बह रहे
अश्रु को...
हृदय से आभारी हूँ..
सादर...
प्रस्तुत है 
उन्हीं की कलम से प्रसवित रचना....





दर्द बेहिसाब मिले ऐ ज़िदगी तुझसे
जीने का हौसला न तोड़ पाये 
जितनी बार दुखा तन मन,
मेरा असहनीय पीड़ाओ से,
व्यथित हृदय के बोझ से
डबडबाये नयन,
पीर की बदरी भरी
बहे कराहकर आँसू जब भी
अश्कों को व्यर्थ न बहने दिया
बंजर सूखे माटी पर बोये
असह्य वेदना में झुलसते
मुरझाये बीजों को सींचकर
नव अंकुरण की प्रतीक्षा की
कटे जीवन वृक्ष के शाखों पर
नव पल्लव की आस लिये
तपते धूप को हँसकर स्वीकार किया
साँझ की फीकी रोशनी
जब आँखों में समायी
न खो कर अंधेरों में 
जलाकर सारी नकारात्मकता
एक दीप आशाओं का
प्रज्जवलित कर सुख के भोर का
पल पल इंतज़ार किया
मौन पल पल शब्दहीन होकर 
अव्यक्त भावों को समेटकर
भरकर लेखनी में
खाली पन्नों को सतरंग किया
ऐ ज़िदगी, तू हार गयी दर्द देकर मुझे
और मैं दर्द सहकर तुझसे जीत गयी

-श्वेता सिन्हा

Monday, July 10, 2017

याद...अर्चना वैद्य करंदीकर















मैंने सुनी थी विरह की बातें मगर
कोयल तो कूकती है; फूल भी खिलते हैं;
पंछी भी चहकते हैं.....
कोई नहीं जान पाता 
तुम्हारे न होने का अंतर
मेरे सिवा...
याद तुम्हारी आती है तो लगता है
जैसे मेरी किताब तुम्हारा चेहरा है
शब्द चेहरे की भाव भंगिमाएँ
और वाक्य तुम्हारी मुस्कान से
लगते हैं मुझे....
वैसे एक अंतर तो है
तुममे और किताब मे
तुम्हे पढना आसान है
मगर तुम्हारी याद के साथ
किताब पढना
बहुत बहुत मुश्किल.....!!!!!

-अर्चना वैद्य करंदीकर


Sunday, July 9, 2017

हया.....पावनी दीक्षित "जानिब"

हया आंखो में अब बहुत मुश्किल से मिलती है 
बेशर्मी आजकल अब यहाँ नाजों से पलती है ।

बयां करदूं अगर सचाई तो कड़वी बहुत होगी
शर्म का छोड़ कर गहना बिना चूनर के चलती है।

नुमाइश जिस्म की करना कहां की ये शराफत हैं 
हर शय दायरे में हो तभी तक सुन्दर लगती है ।

हार बैठा दुशासन तन से नौ गज खींच कर साडी 
मगर आज कल कपडों मे कितनी देर लगती है ।

आज़ादी का नहीँ मतलब शर्म अपनी गवां बैठें 
कटारी तेज हो कितनी म्यान मे अच्छी लगती हैं ।

मुझे कमज़ोर समझे तो समझने दीजिए जानिब 
लाज से हों झुकी पलकें तो नारी नारी लगती है।
- पावनी दीक्षित  "जानिब"

Saturday, July 8, 2017

आदतन नाम आ गया लब पर तेरा......नकुल गौतम

अब मेरे दिल में नहीं है घर तेरा
ज़िक्र होता है मगर अक्सर तेरा

हाँ! ये माना है मुनासिब डर तेरा
आदतन नाम आ गया लब पर तेरा

भूल तो जाऊँ तुझे पर क्या करूँ
उँगलियों को याद है नम्बर तेरा

कर गया ज़ाहिर तेरी मजबूरियां
टाल देना बात यूँ हँस कर तेरा

शुक्र है! आया है पतझड़ लौट कर
बाग़ से दिखने लगा फिर घर तेरा

वो मुलाक़ात आख़िरी क्या खूब थी
भूल जाना लाश में खंजर तेरा

कोई बतलाये अगर मैं हूँ किधर
तब तो शायद बन सकूँ रहबर तेरा

हैं क़लम की भी तो कुछ मजबूरियाँ
थक गया हूँ नाम लिख लिख कर तेरा

बावरेपन की 'नकुल' अब हद हुई
इश्क़ उसको? वो भी मुझसे? सर तेरा!

Friday, July 7, 2017

अवलोकन.....








लिखी जाती है कविता
कवि की भावनाएँ रहती है
समाहित जिसमें
उस कविता को पाठक पढ़ता है तो
उसमें  प्रयास करता है...
ढूंढने का भाव, कवि का
पर नहीं आता है समझ
फिर देखता है
उतार-चढ़ाव
शब्द-विन्यास
प्रेम भाव....
और मर्म साथ में
धर्म भी..
असफल होने पर
फिर तलाशता है
अर्थ दूसरा ..
उस कविता में..
अंत में देखता है
कवि का नाम..
यदि कवि ख्याति प्राप्त है
तो प्रतिक्रिया देगा...

यदि कोई चलताऊ
कवि हो तो...
लिखेगा...लगे रहो

सादर...





Thursday, July 6, 2017

फल वाली....कुमार अवधेश सिंह


ऑफिस से निकल कर शर्माजी ने स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया,

पत्नी ने कहा था 1 दर्ज़न केले लेते आना।

तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा केले बेचते हुए एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी।

वैसे तो वह फल हमेशा "राम आसरे फ्रूट भण्डार" से ही लेते थे,
पर आज उन्हें लगा कि क्यों न बुढ़िया से ही खरीद लूँ ?

उन्होंने बुढ़िया से पूछा, "माई, केले कैसे दिए"

बुढ़िया बोली, बाबूजी 20 रूपये दर्जन,
शर्माजी बोले, माई 15 रूपये दूंगा।
बुढ़िया ने कहा, 18 रूपये दे देना, दो पैसे मै भी कमा लूंगी।

शर्मा जी बोले, 15 रूपये लेने हैं तो बोल, बुझे चेहरे से बुढ़िया ने,"न" में गर्दन हिला दी।

शर्माजी बिना कुछ कहे चल पड़े और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर
केले का भाव पूछा तो वह बोला 28 रूपये दर्जन हैं

बाबूजी, कितने दर्जन दूँ ? शर्माजी बोले, 5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ, ठीक भाव लगाओ।

तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया। बोर्ड पर लिखा था- "मोल भाव करने वाले माफ़ करें"

शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा, उन्होंने कुछ सोचकर स्कूटर को वापस ऑफिस की ओर मोड़ दिया।

सोचते सोचते वह बुढ़िया के पास पहुँच गए। बुढ़िया ने उन्हें पहचान लिया और बोली,

"बाबूजी केले दे दूँ, पर भाव 18 रूपये से कम नही लगाउंगी।
शर्माजी ने मुस्कराकर कहा, माई एक नही दो दर्जन दे दो और भाव की चिंता मत करो।

बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा। केले देते हुए बोली। बाबूजी मेरे पास थैली नही है । फिर बोली, एक टाइम था जब मेरा आदमी जिन्दा था

तो मेरी भी छोटी सी दुकान थी। सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर।
आदमी की बीमारी में दुकान चली गयी,आदमी भी नही रहा। अब खाने के भी लाले पड़े हैं। किसी तरह पेट पाल रही हूँ। कोई औलाद भी नही है
जिसकी ओर मदद के लिए देखूं।
इतना कहते कहते बुढ़िया रुआंसी हो गयी, और उसकी आंखों मे आंसू आ गए ।

शर्माजी ने 50 रूपये का नोट बुढ़िया को दिया तो
वो बोली "बाबूजी मेरे पास छुट्टे नही हैं।

शर्माजी बोले "माई चिंता मत करो, रख लो, अब मैं तुमसे ही फल खरीदूंगा, और कल मै तुम्हें 500 रूपये दूंगा। धीरे धीरे चुका देना और परसों से बेचने के लिए मंडी से दूसरे फल भी ले आना।

बुढ़िया कुछ कह पाती उसके पहले ही शर्माजी घर की ओर रवाना हो गए। घर पहुंचकर उन्होंने पत्नी से कहा, न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से पेट पालने वाले, थड़ी लगा कर सामान बेचने वालों से
मोल भाव करते हैं किन्तु बड़ी दुकानों पर मुंह मांगे पैसे दे आते हैं।

शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है। गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर अधिक ध्यान देने लगे हैं।

अगले दिन शर्माजी ने बुढ़िया को 500 रूपये देते हुए कहा, "माई लौटाने की चिंता मत करना। जो फल खरीदूंगा, उनकी कीमत से ही चुक जाएंगे। जब शर्माजी ने ऑफिस मे ये किस्सा बताया तो
सबने बुढ़िया से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया।
तीन महीने बाद ऑफिस के लोगों ने स्टाफ क्लब की ओर से
बुढ़िया को एक हाथ ठेला भेंट कर दिया।
बुढ़िया अब बहुत खुश है। उचित खान पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी पहले से बहुत अच्छा है ।
हर दिन शर्माजी और ऑफिस के दूसरे लोगों को दुआ देती नही थकती।

शर्माजी के मन में भी अपनी बदली सोच और एक असहाय निर्बल महिला की सहायता करने की संतुष्टि का भाव रहता है..!
जीवन मे किसी बेसहारा की मदद करके देखो यारों,
अपनी पूरी जिंदगी मे किये गए सभी कार्यों से
ज्यादा संतोष मिलेगा...!!