Friday, August 18, 2017

इंतज़ार मत करना.....राजेश "ललित" शर्मा


इंतज़ार मत करना
अब मेरा
थक गये हैं पाँव
मुश्किल है चलना
मोड़ अभी भी बहुत हैं
ज़िंदगी के
याद कर लेना
कभी हो सके
मेरे अक्स को।
- राजेश "ललित" शर्मा 

Thursday, August 17, 2017

आईने.....पंकज कुमार शर्मा



बरसो से जड़े हैं..
तेरे घर में जो आईने
उनका खयाल करना
उनमें तेरे हर दौर की शक्ल है.
उन्होंने तेरी शक्ल को
संवारा है..
हर दाग को मिटाया है.
-पंकज कुमार शर्मा


Wednesday, August 16, 2017

हारना मैने कभी सीखा नहीं....कवि डी. एम. मिश्र


प्यार मुझको भावना तक ले गया
भावना को वन्दना तक ले गया।

रूप आँखों में किसी का यूँ बसा
अश्रु को आराधना तक ले गया।

दर्द से रिश्ता कभी टूटा नहीं
पीर को संवेदना तक ले गया।

हारना मैने कभी सीखा नहीं
जीत को संभावना तक ले गया।

मैं न साधक हूँ , न कोई संत हूँ
शब्द को बस साधना तक ले गया।

अब मुझे क्या और उनसे चाहिए
एक पत्थर, प्रार्थना तक ले गया।
-कवि डी. एम. मिश्र 
प्रस्तुतिः सुशील कुमार

Tuesday, August 15, 2017

ऊँगली मत छोड़ना....सीमा 'सदा' सिंघल


कुछ मुस्कराहटों को 
आज मैंने देखा 
उदासियों के दरवाजे पे
दस्तक़ देते हुए
खुशियों ने
आना शुरू किया
ये कहते हुए
हम तो बस यूं ही
बिना बुलाये चले आते है
तुम हौसले की
ऊँगली मत छोड़ना !!
- सीमा 'सदा' सिंघल

Monday, August 14, 2017

थम न जाए कहीं जुनूँ....फरिहा नकवी

ऐ मिरी ज़ात के सुकूँ आ जा 
थम न जाए कहीं जुनूँ आ जा 

रात से एक सोच में गुम हूँ 
किस बहाने तुझे कहूँ आ जा 

हाथ जिस मोड़ पर छुड़ाया था 
मैं वहीं पर हूँ सर निगूँ आ जा 

याद है सुर्ख़ फूल का तोहफ़ा? 
हो चला वो भी नील-गूँ आ जा 

चाँद तारों से कब तलक आख़िर 
तेरी बातें किया करूँ आ जा 

अपनी वहशत से ख़ौफ़ आता है 
कब से वीराँ है अंदरूँ आ जा 

इस से पहले कि मैं अज़िय्यत में 
अपनी आँखों को नोच लूँ आ जा 

देख! मैं याद कर रही हूँ तुझे 
फिर मैं ये भी न कर सकूँ आ जा 
-फरिहा नकवी
प्रस्तोताः अशोक खाचर

Sunday, August 13, 2017

"मन खट्टा"....राजेश”ललित”शर्मा


मन खट्टा हो गया
चल यार
कैसी बात करता है
मन कभी मीठा हुआ
कभी सुना क्या?
नहीं न
यूँ ही जमी रहेगी दही
रिश्तों की
खटास रहेगी ही
चाहे जितना डालो चीनी
फिर मन खट्टा
हुआ तो हुआ
क्या करें?????
-राजेश”ललित”शर्मा

Saturday, August 12, 2017

फिर...आपकी देह के इर्द-गिर्द... मन की उपज


जब आप बीमार रहते हैं तो 
बना रहता है हुजूम
तीमारदारों का 
और ये.. 
वो ही रहते हैं 
जिनकी बीमारी में...
आपने चिकित्सा व्यवस्था 
करवाई थी 
पर भगवान न करे...
आपकी मृत्यु हो गई 
तो...वे 
आपको आपके घर तक 
पहुंचा भी देंगे..
और फिर...
....आपकी देह के 
इर्द-गिर्द... 
रिश्तेदारों का 
जमावड़ा शुरु हो जाएगा...
कुछ ये जानने की 
कोशिश में रहेंगे कि 
हमें कुछ दे गया या नहीं....
यदि नहीं तो... 
आस लग जाती है 
घर के बचे लोगों से 
कि निशानी को तौर पर 
क्या कुछ मिलेगा..
पर डटे रहते हैं 
पूरे तेरह दिन तक...
-मन की उपज

Friday, August 11, 2017

नदी होना आसान नहीं होता …मंजू मिश्रा



काट कर पत्थर
नदी होकर जनमना
फिर ठोकरें खाते हुए
दिन रात बहना
और बहते बहते
ना जाने कितना कुछ
अच्छा - बुरा
सब समेटते जाना
और बहुत कुछ
पीछे भी छोड़ते जाना
नदी बने रहने की प्रक्रिया  में
बहुत कुछ छूट जाता है
बहुत कुछ टूट जाता है
सच....

नदी होना
आसान नहीं होता
-मंजू मिश्रा

Thursday, August 10, 2017

फांद गए आग पर....गोपाल "गुलशन"


देखकर तेरी रजा को, डूब मैं इतना गया।
पागलों सा हो गया, अश्क नैनों में भरा॥

चल पड़ा उस ओर मैं, उम्मीद एक जोड़कर।
फूल-फूल चुन लिए, पात-पात छोड़कर॥

हौसले बुलन्द हुए, संकेत तेरा मिल गया।
देखकर तेरी रजा को, डूब मैं इतना गया॥

सब्र न अब हो सका, प्यार का पहरा हुआ।
संगीत के छन्द भी, साथ मेरे चल दिए॥

एक छन्द ने कहा, प्यार आज हो गया।
देखकर तेरी रजा को, डूब मैं इतना गया॥

कदम तो अब बढ़ गया, आस की राह थी।
फांद गए आग पर, न जान की परवाह की॥

ख्वाब बस एक था, ओंठ तेरी चूम लूँ।
बाँह तेरी डालकर, एक बार झूम लूँ॥

संगीत भी चल रहा, काव्य न पूरा हुआ।
देखकर तेरी रजा को,डूब मैं इतना गया॥

बाराबंकी (उत्तर प्रदेश) 

Wednesday, August 9, 2017

अनोखा दान.......सुभद्रा कुमारी चौहान

अपने बिखरे भावों का मैं,
गूँथ अटपटा सा यह हार।
चली चढ़ाने उन चरणों पर,
अपने हिय का संचित प्यार॥

डर था कहीं उपस्थिति मेरी,
उनकी कुछ घड़ियाँ बहुमूल्य।
नष्ट न कर दे, फिर क्या होगा,
मेरे इन भावों का मूल्य?

संकोचों में डूबी मैं जब,
पहुँची उनके आँगन में।
कहीं उपेक्षा करें न मेरी,
अकुलाई सी थी मन में।

किंतु अरे यह क्या,
इतना आदर, इतनी करुणा, सम्मान?
प्रथम दृष्टि में ही दे डाला,
तुमने मुझे अहो मतिमान!

मैं अपने झीने आँचल में,
इस अपार करुणा का भार।
कैसे भला सँभाल सकूँगी,
उनका वह स्नेह अपार।

लख महानता उनकी पल-पल,
देख रही हूँ अपनी ओर।
 मेरे लिए बहुत थी केवल,
उनकी तो करुणा की कोर।
- सुभद्रा कुमारी चौहान 
(१६ अगस्त १९०४-१५ फरवरी १९४८)

Tuesday, August 8, 2017

और कई कुंतियाँ........आशीष "वैरागी"

जाम कब्ज़ों में फँसे अंधे किवाड़
देख संजय, खिड़कियों के पार क्या है॥

सात किरणों की लगामें सूर्य पर थी
और उत्तरों में फँसी कुंती बेचारी॥

वो कौन था जिसने कर्ण को लांछित किया
अरे सूर्य ही तो स्रोत है सृष्टि का सारी॥

इस धरा पर ताप बिन कोई जिया क्या
फिर कहो उन पांडवों का दोष क्या था॥

धर्म रक्षा में हुई संतान-क्षतियाँ
पर कुंतियों, गंधारियों का दोष क्या था॥

जिनका, धर्म से, संदर्भ से, पौरुष बढ़ा है 
उन मनुजों, अज्ञानियों का पार क्या है॥
-आशीष "वैरागी"
ashish.vairagyee@gmail.com

Monday, August 7, 2017

डोर हमसफर की......ममता भारद्वाज


मनवा संभालू कैसे डोर हमसफर की
थक गई चलते-चलते राह जिंदगी की
जहां तलाश थी ताउम्र मुस्कुराने की
वहीं भूल गई मुस्कुराना जिंदगी में  

किससे करूं गिला किससे करूं शि‍कायत
जो खो गई आवारगी में
था सर पर ताज जीवन तलाश ना सकी
आज जमाने से लाचार पड़ी है जिंदगी

रंग में उसके ढाल लिया खुद को
मगर रास ना आया कोई जिंदगी में
कैसी है डोर मेरी और उसकी
थक गई बोझ उठाते-उठाते हमराह का  

है कशमकश ये कैसी
जो कदम-कदम पर
आंखे नम हो गई जिंदगी से
मनवा कैसा है ये बंधन स्नेह का
जहां दर्द और तन्हाई है जिंदगी

-ममता भारद्वाज     

Sunday, August 6, 2017

मैं बैचैन था रातभर लिखता रहा....हिन्दी साहित्य मंच से


दर्द कागज़ पर मेरा बिकता रहा..!!
मैं बैचैन था रातभर लिखता रहा....!!

छू रहे थे सब बुलंदियाँ आसमान की..!!
मैं सितारों के बीच, चाँद की तरह छिपता रहा....!!

दरख़्त होता तो, कब का टूट गया होता..!!
मैं था नाज़ुक डाली, जो सबके आगे झुकता रहा....!!

बदले यहाँ लोगों ने, रंग अपने-अपने ढंग से..!!
रंग मेरा भी निखरा पर, मैं मेहँदी की तरह पिसता रहा....!!

जिनको जल्दी थी, वो बढ़ चले मंज़िल की ओर..!!
मैं समन्दर से राज गहराई के सीखता रहा....!!

........हिन्दी साहित्य मंच से

Saturday, August 5, 2017

सौंदर्यबोध...सर्वेश्वरदयाल सक्सेना


अपने इस गटापार ची बबुए के
पैरों में शहतीरें बांधकर
चौराहे पर खड़ा कर दो,
फिर, चुपचाप ढ़ोल बजाते जाओ,
शायद पेट भर जाए :
दुनिया विवशता नहीं
कुतूहल खरीदती है|


भूखी बिल्ली की तरह
अपनी गरदन में संकरी हाँडी फँसाकर
हाथ-पैर पटको,
दीवारों से टकराओ,
महज छटपटाते जाओ,
शायद दया मिल जाए:
दुनिया आँसू पसन्द करती है
मगर शोख चेहरों के|


अपनी हर मृत्यु को
हरी-भरी क्यारियों में
मरी हुई तितलियों-सा
पंख रंगकर छोड़ दो,
शायद संवेदना मिल जाए :
दुनिया हाथों-हाथ उठा सकती है
मगर इस आश्वासन पर
कि रुमाल के हल्के-से स्पर्श के बाद
हथेली पर एक भी धब्बा नहीं रह जाएगा|


आज की दुनिया में
विवशता,
भूख,
मृत्यु,
सब सजाने के बाद ही
पहचानी जा सकती है|
बिना आकर्षण के दुकानें टूट जाती हैं|
शायद कल उनकी समाधियां नहीं बनेंगी
जो मरने के पूर्व
कफ़न और फूलों का
प्रबन्ध नहीं कर लेंगें|
ओछी नहीं है दुनिया:
मैं फिर कहता हूँ,
महज उसका सौंदर्य-बोध
बढ़ गया है|




15 सितंबर 1927 -- 23 सितंबर 1983

Friday, August 4, 2017

हंसते-हंसते वह रोया है....डॉ. सुरेश उजाला





मैली चादर को धोया है.
हंसते-हंसते वह रोया है.

वही काटना सदा पड़ेगा,
जीवन में जो कुछ बोया है.

आज उसे अहसास हो गया,
क्या पाया है क्या खोया है.

नब्ज़ समय की पकड़ में आई,
शुष्क आंत को अब टोया है.

उसकी क्यों कर कमर झुकेगी,
जिसने भार नहीं ढोया है.

सपनों में चुसका लेने दो,
बच्चा रो कर के सोया है.

-डॉ. सुरेश उजाला

सम्पर्क : 
108, तकरोही, 
पं. दीनदयाल मार्ग, 
इन्दिरा नगर, 
लखनऊ (उ.प्र.)
साभारः रचनाकार

Thursday, August 3, 2017

बहुत साफ है मन का आईना......हिन्दी साहित्य मंच से


एक सिलसिला सा चल रहा है
दिल आंसुओं में गल रहा है

कभी झांककर देखा अपने अंदर
हर तरफ वहां कुछ जल रहा है

आग लगी है रूह के धागे में
जिस्म मोम सा पिघल रहा है

बहुत साफ है मन का आईना
आंसुओं से जब वो धुल रहा है
......हिन्दी साहित्य मंच से

Wednesday, August 2, 2017

‘छाँव तो कर दे’....पीयूष शिवम


कब  से चल रहा हूँ धूप में तेरी,
ज़िन्दगी इस दोपहर में छाँव तो कर दे।

याद धुंधली हो गई गर्दिश में गहरा कर,
इक दफ़ा मेरे शहर को गाँव तो कर दे।

ख़ून देखा है नहीं अपना बहुत दिन से,
ख़ंजर-ए-हालात के कुछ घाव तो कर दे।

ये तसल्ली है कि तूफाँ में भी तिनका है,
ये इरादा है कि इसको नाव तो कर दे।

बीतने को है यहाँ अरसा बहार आए,
इस तरफ इक बार अपने पाँव तो कर दे।

आज निकला 'शिवम्' औक़ात जानने,
और को दे छोड़, खुद का भाव तो कर दे।

Tuesday, August 1, 2017

पेड़ सी होती है स्त्री.....निधि सक्सेना



पेड़ सी होती है स्त्री
भावों और अनुभावो की असंख्य पत्तियों से लदी
विभिन्न प्रकार की पत्तियाँ
उमंग की पंखाकार पत्तियाँ..
सपनों की छुईमुई सी पत्तियाँ ..
अकुलाहट की त्रिपर्णी पत्तियाँ ..
ईर्ष्या की दंतीय पत्तियाँ ..
कुंठा की कंटीली पत्तियाँ
क्षोभ और प्रतिशोध की भालाकार पत्तियाँ ..
प्रतीक्षा की कुंताभ पत्तियाँ ..
स्नेह की हृदयाकार पत्तियाँ ..
प्रेम की एकपर्णी पत्तियाँ ..
पतझड़ भी एक सतत् प्रक्रिया है
भाव झड़ते रहते हैं
पुनः पुनः अंकुरित होने को
बहुधा कोई भाव मन के किसी प्रच्छन्न कोने में ठहर जाता है 
फलित होकर पुष्प बनता है..
सृष्टि की हर कविता इसी पुष्प से उपजी सुगंध है..
~निधि सक्सेना